इस स्कूल में पढ़ाया जाता है स्वच्छता का पाठ, बांटे जाते हैं सेनेटरी नैपकिन

बच्चों में एक आयु सीमा के बाद परिवर्तन होना स्वाभाविक और प्राकृतिक है। स्कूल पूरी कोशिश करता है कि बच्चों को इन परिवर्तनों के बारे में जागरूक करे। छात्राओं को आयरन की गोलियां और सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराया जाता है।

Daya SagarDaya Sagar   13 Feb 2019 9:26 AM GMT

संतकबीर नगर: बात स्कूल को स्वच्छ बनाने की हो या फिर छात्रों के व्यक्तिगत स्वच्छता की, खलीलाबाद के पूर्व माध्यमिक विद्यालय, बयारा ने अपने क्षेत्र में एक खास पहचान बनाई है। यह स्कूल पूरे क्षेत्र के लिए एक 'आदर्श स्कूल' है।


स्कूल के प्रधानाध्यापक राकेश कुमार बताते हैं, 'साफ-सफाई, रंगाई-पुताई (मेंटेनेंस) के लिए हर साल शिक्षा विभाग से 7000 रुपये मिलते हैं, जो कि नाकाफी है। इसलिए विद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी और ग्राम पंचायत की मदद से विधालय की रंगाई-पुताई का काम कराया जाता है। छात्र- छात्राओं को सफाई के हर पहलुओं के बारे में जागरूक किया जाता है। पढ़ाई के लिए जिस वातावरण की जरूरत होती है, वह सफाई से ही आ सकती है। इसके लिए विद्यार्थियों को कार्यशाला (वर्कशॉप) लगाकर प्रशिक्षित किया जाता है और उनसे अपील की जाती है कि वे सिर्फ विद्यालय को नहीं बल्कि अपने घर और आस-पास के इलाके को भी साफ रखें।'



लड़कियों को दिए जाते हैं सेनेटरी नैपकिन

राकेश कहते हैं, 'बच्चों में एक आयु सीमा के बाद परिवर्तन होना स्वाभाविक और प्राकृतिक है। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते हैं कि बच्चों को इन परिवर्तनों के बारे में जागरूक करें। स्वास्थ्य विभाग की जिला टीम के सहयोग से हम कार्यशाला आयोजित करवाते हैं। छात्राओं को आयरन की गोलियां और सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराया जाता है। लड़कियों की अच्छी सेहत के लिए जरूरी है कि वे स्वच्छता के महत्व को समझें। सेनेटरी नैपकिन देना इसी के तहत एक छोटी सी पहल है।'



शिक्षिका योगिता पाल कहती हैं, 'हम लड़कियों को सेनेटरी नैपकिन का लाभ तो समझाते हैं साथ ही घर-घर जाकर उनकी माताओं को भी जागरूक करते हैं। हमें इसके लिए 'किशोरी सुरक्षा योजना' के तहत विशेष प्रशिक्षण भी मिला है। लड़कियों और उनकी मां को सेनेटरी नैपकिन के लिए सहज करना मुश्किल तो होता है लेकिन इस प्रशिक्षण के तहत हम उन्हें ऐसा माहौल देते हैं कि वे अपनी बात खुलकर कह सकें। हम उन्हें बताते हैंकि सेनेटरी नैपकिन का प्रयोग करना अधिक सुरक्षित और फायदेमंद है। विद्यालय में इंसिनेटर भी लगाया गया है।'




साफ पानी के लिए आरओ मशीन

विद्यालय में छात्र और छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय बना हुआ है, जिसकी नियमित सफाई होती है। स्वच्छ पेय जल के लिए आरओ मशीन भी है। स्कूल परिसर में हाथ धोने के लिए 12 नल लगाए गए हैं।




फर्श पर टाइल्स और सीमेंट से जुड़े बेंच




काया-कल्प योजना के तहत ग्राम पंचायतों में सरकारी विद्यालयों के लिए पैसा आता है। ग्राम प्रधान छोटे लाल यादव की मदद से प्रधानाध्यापक राकेश कुमार ने उसी फंड का इस्तेमाल कर स्कूल में टाइल्स लगवाए हैं। इससे विद्यालय में गंदगी भी नहीं होती और परिसर सुंदर और आकर्षक दिखता है। इसके अलावा सीमेंट से जुड़े हुए मजबूत बेंचों का भी निर्माण कराया गया है।"

शिक्षकों से मिलता है बेहतर सहयोग




प्रधानाध्यापक राकेश कुमार कहते हैं, 'किसी भी कार्य को सफल बनाने के लिए टीम वर्क बहुत जरूरी होता है। टीम अच्छी हो तो काम भी बेहतर होता है। मुझे बहुत ही अच्छे सहयोगी मिले हैं और मुझे उन पर गर्व है। हम विद्यालय और बच्चों की बेहतरी के लिए मिलकर योजना बनाते हैं। सबकी राय ली जाती है और इसके बाद ही योजना का क्रियान्वयन होता है।'

बच्चों के नामांकन और उपस्थिति के लिए प्रचार-प्रसार



पूर्व माध्यमिक विद्यालय बयारा भले ही एक सरकारी स्कूल है लेकिन इसका प्रचार-प्रसार प्राइवेट स्कूलों की तरह किया जाता है। आस-पास के गांवों में विद्यालय के होर्डिंग लगाए जाते हैं। इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी इसका प्रचार किया जाता है। विद्यालय का अपना फेसबुक और यूट्यूब पेज है।सत्र की शुरुआत में शिक्षक घर-घर जाकर नामांकन की अपील करते हैं। इसके अलावा अगर कोई बच्चा लंबे समय तक अनुपस्थित रहता है तो शिक्षक उसके परिवार वालों से मिलते हैं।"

हाईस्कूल के पहले 8वीं में ही बच्चों को प्रायोगिक शिक्षा



विद्यालय के शिक्षक और प्रधानाचार्य हर मामले में विद्यार्थियों को बेहतर बनाना चाहते हैं। इसके लिए हाल ही में विज्ञान की एक प्रयोगशाला का निर्माण किया गया है। प्रयोगशाला के दीवारों को विभिन्न तरह के वैज्ञानिक चित्रों से सजाया गया है ताकि बच्चे दसवीं और आगे की कक्षाओं के लिए पहले से ही तैयार हो सकें।

छात्रों का क्या है कहना?



8वीं क्लास में पढ़ने वाले 13 साल के शिवम कहते हैं, 'पहले स्कूल अच्छा नहीं लगता था। घर से स्कूल के लिए निकलता तो था लेकिन दोस्तों के साथ घूमने और खेलने निकल जाता था। आज स्कूल पूरी तरह बदल चुका है। साफ-सुथरे माहौल में पढ़ाई करना बहुत अच्छा लगता है।'



शिवम का प्रिय विषय विज्ञान है और वह तत्वों और यौगिकों के रासायनिक नाम जुबानी बता लेता है। शिवम के साथ बैठे कृष्णा को गणित के सवाल पहले अबूझ पहेली लगते थे लेकिन वह अब इनसे जूझता है और सवालों के साथ कुश्ती करता है। उसे त्रिकोणमिति के साइन sin, cos आदि अब अंग्रेजी के कोई शब्द नहीं बल्कि मैथ्स के ही सिंबल लगते हैं।


15 साल की सीमा साइकिल से स्कूल आती है क्योंकि उसका घर उसके स्कूल से 3 किलोमीटर दौड़ है। उसे अब गांव की सकरी पगडंडियों पर साइकिल चलाने में डर नहीं लगता। सीमा कई बार अपने मां की बात भी टाल देती है क्योंकि उसे स्कूल आने की जल्दी होती है। सीमा आगे भी अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है। कक्षा आठवीं की ही सीमा कहती हैं, ' मैं तीन किलोमीटर दूर से पढ़ने आती हूं। पहले मैं हफ्ते में दो-तीन दिन छुट्टी ले लेती थी, लेकिन अब मैं नियमित रूप से स्कूल आती हूं। यहां पढ़ाई के साथ-साथ स्वच्छ और स्वस्थ रहने का भी पाठ पढ़ाया जाता है।'



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