ग्रामीणों के प्रयास से टूटी जाति-धर्म की दीवार

Divendra SinghDivendra Singh   27 Aug 2018 5:39 AM GMT

ग्रामीणों के प्रयास से टूटी जाति-धर्म की दीवार

माल (लखनऊ)। कई ऐसे विद्यालय हैं जहां पर विद्यालय प्रबंधन समितियां न केवल शिक्षा व्यवस्था में सुधार ला रहे हैं बल्कि समाज में जाति धर्म की दीवार भी तोड़ने का काम कर रहे हैं। इस विद्यालय में रसोइया के बनाए मिड डे मील को खाने से मना करने पर शिक्षकों, ग्राम प्रधान व विद्यालय प्रबंधन समिति की सदस्यों के प्रयास से बच्चों ने खाना खाया और इस ऊंच-नीच की इस सोच को बदला।

"हर दिन की तरह उस दिन भी खाना बनाने के बाद बच्चों के पास गई तो कई बच्चे नहीं आए, हमारे लिए सारे बच्चे ही एक जैसे हैं, लेकिन बच्चे आ ही नहीं रहे थे, "रसोईया लज्जावती बताती हैं। लज्जावती लखनऊ जिला मुख्यालय से लगभग 45 किमी. दूर के माल ब्लॉक के पीरनगर पूर्व माध्यमिक में पिछले कई वर्षों से रसोइया हैं, लेकिन कभी बच्चों ने खाने से मना नहीं किया था।


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पूर्व माध्यमिक विद्यालय व प्राथमिक विद्यालय, पीरनगर दोनों आमने-सामने ही हैं, इनमें विद्यालय प्रबंधन समिति के सहयोग से शिक्षा के स्तर में काफी सुधार आया है, विद्यालय में कोई भी परेशानी हो एसएमसी के सदस्य व ग्राम प्रधान अपने स्तर से सुलझा लेते हैं। लेकिन एक बार बच्चों ने खाना खाने से मना कर दिया था। इसके बारे में एसएससी की सदस्य मीरादेवी बताती हैं, "मेरी एक बेटी तक स्कूल में पढ़ती थी, जब बच्चे स्कूल से लौटे तो बताने लगे कि आज कई लोगों ने खाना ही नहीं खाया, मुझे लगा कि रसोईया दीदी भी तो हमारी ही तरह है अगर स्कूल में ऐसा रहेगा तो बच्चे क्या सीखेंगे।"

"छोटे-छोटे बच्चे हैं इन्हें जाति-धर्म के बारे में क्या पता, अगर स्कूल में ही ऐसा होता रहा तो बच्चे भी यही सीखेंगे, एसएमसी के सदस्य इतने एक्टिव हैं कोई भी काम हो सब तैयार रहते हैं, उस समय पर भी सबका साथ मिला और अब सब अच्छे से चल रहा है, "प्रधानाध्यापिका पुष्पा देवी ने बताया।

शाम को विद्यालय प्रबंधन समिति के लोगों ने मीटिंग की सुबह स्कूल जाएंगे, दूसरे दिन सुबह बच्चों के साथ ही उनके अभिभावक भी स्कूल पहुंच गए और प्रधानाध्यापिका के साथ बैठकर बात की। विद्यालय प्रबंधन समिति की उपाध्यक्ष संतोष कुमारी कहती हैं, "मेरी भी दो बेटियों ने वहीं से पढ़ाई की थी और अभी भी एक बेटी पढ़ रही है, कभी ऐसा नहीं हुआ था, गाँव में जाति को लेकर हमेशा ही कुछ न कुछ होता रहता है, लेकिन स्कूल कभी नहीं था।"

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जब एसएमसी सदस्यों के समझाने पर भी लोग नहीं माने तो मीटिंग में ये फैसला हुआ कि ग्राम प्रधान, विद्यालय प्रबंधन समिति व अध्यापक सभी मिलकर विद्यालय में ही खाना खाएंगे।


विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष लाल बहादुर बताते हैं, "मेरा बेटा आयुष प्राथमिक विद्यालय में तीसरी में पढ़ता है, जब खाने की बात आयी तो हमने भी स्कूल में खाना खाया, तब जाकर लोगों का विरोध कम हुआ और आज सब अच्छे से चल रहा है।

"मेरी मम्मी लोग हमेशा स्कूल में आती रहती हैं अगर मैं स्कूल नहीं जाना चाहती फिर भी मम्मी मुझे स्कूल भेजती हैं, मेरे साथ में पढ़ने वाले दूसरे लोगों के घर जाकर भी समझाती हैं।"
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एसएमसी के सहयोग से बढ़ी इन विद्यालयों में बच्चों की संख्या

"एक समय था हमारे विद्यालय में बीस से ज्यादा बच्चे नहीं आते थे, कितना भी समझाओ अभिभावक नहीं समझते थे, लेकिन जब से अभिभावकों को ही जिम्मेदारी दी गई, वो अपनी जिम्मेदारी समझ रहे हैं, पहले हमारे यहां 29 बच्चे थे, अब 59 बच्चे हैं अभी एडमिशन हो ही रहे हैं, "पूर्व माध्यमिक विद्यालय की प्रधानाध्यापिका पुष्पा देवी ने बताया।

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विद्यालय में होती है नियमित एसएमसी की मीटिंग


प्राथमिक विद्यालय पीरनगर में हर महीने की पांच या छह तारीख़ को विद्यालय प्रबंधन समिति की बैठक होती है। 15 सदस्यों में से हर मीटिंग में 10 से 12 लोग शामिल होते हैं। मीटिंग में किन-किन विषयों पर चर्चा होती है और उसमें क्या सुधार किया जाता है इसकी पूरी रिपोर्ट रजिस्टर में लिखी होती है। लखनऊ में काम कर रही एक गैर सरकारी संस्था वात्सल्य द्वारा प्लान इण्डिया के सहयोग से इस विद्यालय में ही नहीं बल्कि माल ब्लॉक के 32 माध्यमिक और पूर्व माध्यमिक में नियमित हर महीने विद्यालय प्रबंधन समिति की मीटिंग होती है।

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गाँव में जाकर बुलाते हैं बच्चों को

"हम लोगों में हर दिन कोई एक सुबह गाँव में घुम लेता है कि कोई बच्चा स्कूल नहीं गया है, अगर नहीं गया है तो उनके अभिभावक से पूछते हैं क्यों नहीं गया है। बारी-बारी से स्कूल में जाकर खाना भी चेक करते हैं, जो कमी होती है उसे पूरा करने की कोशिश करते हैं, "विद्यालय प्रबंधन समिति के उपाध्यक्ष लाल बहादुर सिंह ने बताया।

हर सदस्य के घर के दरवाजे पर लगी है, उनके नाम की नेम प्लेट

गैर सरकारी संस्था वात्सल्य के सहयोग से विद्यालय प्रबंधन समितियों को समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है और उनके अधिकारों के बारे में जागरूक किया जाता है। वात्सल्य संस्था के ब्लॉक क्वार्डिनेटर सौरभ सिंह बताते हैं, "एसएमसी सदस्यों को अलग पहचान मिले इसलिए सभी अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व सदस्यों के घर पर नेम प्लेट लगायी गई है।"

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