नयापुरवा में चली शिक्षा की पुरवाई

आदिवासी कोल जनजाति के बच्चे शिक्षा को लेकर हुए जागरूक, अभिभावकों के साथ बदल रहे तस्वीर

नयापुरवा में चली शिक्षा की पुरवाई

रुकमा बुजुर्ग (चित्रकूट)। छोटू के बालों को संवारकर उसके बैग में कॉपियां रखते हुए, गीता, सचिन को आवाज देती हैं, "धूप बहुत तेज है, जल्दी से छाता लेकर आओ, चलने का समय हो गया है।" एक ही छाते में छोटू और सचिन स्कूल की ओर चल देते हैं। गीता के लिए तो उसकी साड़ी का आंचल ही काफी है।

गीता, चित्रकूट के देवांगना घाटी के ऊपर बसे गाँव रुकमा बुजुर्ग में रहने वाली, कोल जनजाति की महिला हैं, जो प्राथमिक विद्यालय नयापुरवा की विद्यालय प्रबंधन समिति की सदस्य भी हैं। छोटू कोल और सचिन कोल, गीता के दोनों बच्चे हैं जो उसी स्कूल के पहली और तीसरी कक्षा में पढ़ते हैं। खुद आठवीं तक पढ़ी गीता, चाहती हैं कि उनके दोनों बच्चे खूब आगे तक पढ़ें।

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गीता कहती हैं, "हमारी तो बहुत पहले ही शादी हो गई थी इसलिए आठवीं के बाद घर-गृहस्थी में जीवन बीतता गया। हम भी पढ़े होते तो आज प्रबंधन समिति सदस्य के बजाय शिक्षक होते।" शायद पढ़ाई न कर पाने की कसक ही है कि मौसम कैसा भी हो गीता बच्चों के साथ स्कूल जाती हैं और साथ ही पड़ोस के बच्चों को भी साथ लाती हैं। वह खुद इलाके में अभिभावकों से मिलती हैं और उन्हें बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती हैं। दोपहर बाद विद्यालय से घर लौटकर भी वह अपने बच्चों को पढाती हैं। वह कहती हैं, "शाम को मैं बच्चों को पढ़ाती हूं। अभी वह छोटा है तो पढ़ा लेती हूं, उसको 30 तक पहाड़े याद हैं।"



प्रधानाध्यापक की कोशिशों का नतीजा, हर घर से बच्चे जा रहे स्कूल

प्रधानाध्यापक, अजय कुमार बताते हैं, "2016 में जब यहाँ मेरी नियुक्ति हुई थी तब छात्रों की उपस्थिति मुश्किल से 40 फ़ीसदी हुआ करती थी। फ़िर हमने मिलकर, घरों में जाकर अभिभावकों से बात करनी शुरू की तब जाके, आज 2 साल बाद, प्रतिदिन 80 प्रतिशत उपस्थिति होती है।" अजय अपने शिक्षकों के साथ हर हफ्ते उन अभिभावकों से मिलने जाते हैं की हाज़िरी कम होती है। "हमने एक अभिभावक संपर्क रजिस्टर भी बनाया है जिसमें अभिभावकों के नंबर हैं। ज़रुरत पड़ने पर हम उन्हें फ़ोन भी करते हैं ," वह आगे बताते हैं।

कोल जाति के लोगों की मानसिकता में ऐसे आया यह बदलाव अब आसपास के जंगलों से आते हैं बच्चे

रुकमा बुजुर्ग ग्राम पंचायत में कई कोल परिवार रहते हैं। "दिन भर तो कोल आदिवासियों के बच्चे उनके साथ लकड़ी इकट्ठे करने जैसे कामों पर जाते थे और शाम को जब खेलने के लिए बाकी बच्चों के पास पहुंचते तो वो सब अपने स्कूल की बातें करते थे। फ़िर हमारी बिटिया ने उनसे पुछा कि क्या वो भी स्कूल जा सकती है। जब यह बात प्रधानाध्यापक तो उन्होंने खुद कोल जाति के बच्चों के घर जाके उनके अभिभावकों को नामांकन के लिए समझाया, "पूनम की नानी ने बताया।

कोल आदिवासी मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में रहते हैं। एक समय में समाज से दूर, जंगलों में रहने वाले बुंदेलखंड के कोल जानजाति के लोग अब शिक्षा के प्रति जागरूक होते दिख रहे हैं। प्राथमिक विद्यालय नयापुरवा में 77 लड़के और 57 लड़कियां, कुल 134 बच्चों का नामांकन है, जिसमें न्यूनतम उपस्थिति 80 फीसदी होती है। चित्रकूट जिले के देवांगना घाटी के ऊपर बसे छोटे से गाँव रुकमा बुजुर्ग में जहां जरूरत का सामान लेने के लिए भी लोगों को 15 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय करनी होती है। इस स्कूल में ज्यादातर बच्चे रुकमा बुजुर्ग गाँव से कुछ आस-पास के गाँव से और कई तो जंगलों से भी आते हैं।

कई किलोमीटर पैदल चलकर आते हैं बच्चे

रुकमा बुजुर्ग ग्राम पंचायत की जनसंख्या करीब 2500 है जहां कुल 6 प्राथमिक विद्यालय हैं। तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली पूनम तीन किलोमीटर पैदल चल कर आती है। ददरी जंगल में बने अपने घर से पूनम राज अकेले ही आती है। पूनम की मां कहती हैं, "हमारी बेटी रोज स्कूल जाने के साथ घर पर भी पढ़ती है। हम तो अंगूठा छाप हैं लेकिन हमारी बेटी जब हमारा नाम लिखती है तो बहुत खुशी होती है।"

बच्चों में जिम्मेदारी का भाव

यहां बदलाव का आलम इस कदर है कि बच्चे खुद बेहद गम्भीर हैं। अब पूनम की बात ही सुनिए, "हमने अम्मा और नानी को छोटे से छोटा काम कर के घर चलाते हुए देखा है। जल्दी ही आगे की पढाई पूर करके मैं अपने परिवार का नाम रोशन करना चाहती हूं। मेरी अम्मा और नानी मुझे रोज स्कूल तो भेजते ही हैं, मैं खुद रोज शाम को घर में पढ़ाई करती हूं।"

"हमारे लिए गर्व की बात है की आदिवासी जनजाति के बच्चे और उनके अभिभावक इस तरह का सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। इस तरह समाज में जो आदिवासी जनजातियों को लेकर अवधारणा बनी हुई है, वो दूर हो जाएगी" अजय कुमार, प्रधानाध्यापक।

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