सेक्युलर माने एक समान

सेक्युलर माने एक समानgaonconnection, padtal

सेक्युलर भारत के उच्चतम न्यायालय में शरीयत कानूनों के खिलाफ़ मुकदमे दायर हुए हैं और समाज में बहस छिड़ी है कि भारत के न्यायालय और भारत की सरकार शरीयत कानूनों में हस्तक्षेप कर सकते हैं या नहीं। भारत का न्यायालय शरीया कानूनों को मान्यता नहीं देता और अस्सी के दशक में शाहबानो नामक महिला को अदालत ने गुजारा भत्ता मंजूर कर दिया था। अब किसी सायरा बानो ने मुकदमा दायर किया है। भारत के मुसलमान शरीया के क्रिमिनल लॉ पर जिद नहीं करते क्योंकि वे बहुत ही सख्त हैं, केवल पर्सनल लॉ पर जिद करते हैं। 

जिन देशों में शरीयत के कानून पूरी तरह लागू हैं वहां चोरी करने वाले के हाथ काट दिए जाते हैं, यौन उत्पीड़न करने वाले का सिर कलम होता है और महिलाओं के गुनाह पर कोड़े बरसाए जाते हैं। भारतीय मुसलमान यह नहीं कहते कि यदि हिन्दू चोरी करे तो जेल और मुसलमान चोरी करे तो हाथ काटो। वे केवल पर्सनल लॉ को लागू करने की बात करते हैं।

जब भारत आजाद हुआ और नया संविधान बना तो पाकिस्तान ने अपने को इस्लामिक देश बनाया था और उसी समय भारत अपने को हिन्दू राष्ट्र बना सकता था लेकिन जैसा उच्चतम न्यायालय ने माना है कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है केवल जीवन शैली है। इसलिए भारत ने सेकयुलर मार्ग अपनाया। तकलीफ की बात तब आई जब भारत के ही अन्दर कश्मीर घाटी में मात्र दो प्रतिशत कश्मीरी पंडित थे उनका भी रहना सम्भव नहीं हो सका। फिर भी हमारे लिए सेकयुलर के अलावा दूसरा मार्ग नहीं है और हजारों साल से भारत सेकयुलर ही रहा है।

यदि हमारे पास ताकत है तो हम अपने से अलग धर्म वालों को शान्ति से रहने दें लेकिन ऐसा होता नहीं है। नेहरू की ही तरह जिन्ना ने भी वादा किया था कि न कोई मुसलमान होगा न कोई हिन्दू सब पाकिस्तानी होंगे। लेकिन विभाजन के समय लाहौर की आबादी ग्यारह लाख थी, जिसमें पांच लाख हिन्दू, पांच लाख मुसलमान और एक लाख सिख थे। तो फिर कहां गई लाहौर की हिन्दू और सिख आबादी। कराची में जब 51 प्रतिशत हिन्दू थे 1947 में और अब 2 प्रतिशत बचे हैं तो कहां गया जिन्ना का वादा और कहां गए हिन्दू और सिख।

भारत के तमाम मुसलमान कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड जैसे सेकयुलर देशों में बस गए हैं तो क्या वहां रहकर वे तीन तलाक, चार पत्नी और इस तरह के दूसरे कानूनों का पालन कर सकते हैं। सोचने की बात है कि यदि कोई कानून दूसरों को प्रभावित करता हो तो वह पर्सनल नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए आसानी से तलाक देकर महिला को छोड़ देंगे और उसे उचित गुजारा भी नहीं देंगे तो वह समाज की जिम्मेदारी बन जाएगी। यदि परिवार नियोजन नहीं मानेंगे तो बच्चों के राशन, शिक्षा और पढ़ाई की जिम्मेदारी समाज या सरकार को लेनी होगी। 

अम्बेडकर पक्के सेकयुलर नेता थे और वह सारे देश के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना चाहते थे। जवाहर लाल नेहरू भी इसके पक्षधर थे लेकिन जब नेहरू ने अम्बेडकर के प्रस्ताव को 1951 में आगे नहीं बढ़ाया तो उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। फिर भी संविधान के नीति निर्देशक सिद्धान्तों में उन्होंने रखा है कि ‘‘सम्पूर्ण भारत में समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास राज्य करेगा।” उच्चतम न्यायालय ने अनेक बार सरकार को निर्देशित किया है कि समान नागरिक संहिता लागू करें। दुर्भाग्य से बंटवारे के बाद भी हिन्दू नेताओं ने समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास तक नहीं किया। भारतीय मुसलमानों और हिन्दुओं की एक साझा कौम नहीं बनने दी। मोदी सरकार के सामने अवसर है और चुनौती भी।

पिछले 67 साल में हमारे राजनेता अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के नाम पर समाज को बांटते रहे हैं। हमारे नेताओं ने मुसलमानों की आइडेन्टिटी यानी पहचान की चिन्ता तो की है, बाकी कुछ नहीं। मैं समझता हूं कि नेहरू, पटेल, अम्बेडकर या लोहिया ने कभी रोजा-अफ्तार की रस्म नहीं निभाई होगी। रोज़ा अफ्तार के बहाने उनके चेलों में रमज़ान की कद्र नहीं बढ़ी हैं, एकमुश्त मुस्लिम वोट की चाहत बढ़ी है।

सेकुलर भारत में सभी धर्मों के लोग यदि अपने-अपने पर्सनल लॉ मानेंगे तो सबका एक साथ रह पाना निश्चित रूप से कठिन हो जाएगा। पर्सनल लॉ मुसलमानों के लिए भी ठीक नहीं क्योंकि 90 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम महिलाएं बहु विवाह के खिलाफ हैं, तीन तलाक को नामंजूर करती हैं और गुजारा के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाती हैं। यदि तब भी शरिया कानून थोपा गया उन पर तो सरकार और अदालतें अपने कर्तव्य से विरत कही जाएगी। हिन्दू या मुसलमान सभी भारतीय महिलाओं का एक जैसा सामाजिक स्तर हो, इसके लिए जरूरी है एक जैसे कानून ।  

यदि हमारे राजनेता हिन्दू-मुस्लिम समरसता चाहते हैं तो आपसी सहनशीलता बढ़ाएं जिससें होली और ईद के त्योहार कहीं भी ग़म के त्योहार न बनें। ताजिए और मूर्ति विसर्जन के समय रास्ते को लेकर तनाव का माहौल न बने। यदि हिन्दू और मुसलमानों की लड़कियां और लड़के कोई गुनाह करें तो उन्हें भारतीय संविधान के हिसाब से सज़ा मिले ना कि फ़तवा, खाप या महापंचायत के हिसाब से। अफसोस कि अपना मतलब बनता है तो संविधान की दुहाई देते है वरना पंचों की राय सिर मत्थे, परनाला वहीं रहेगा। 

भारतीय मुसलमानों को खुश करने के लिए भारत के हिन्दू नेताओं ने सच्चर कमीशन बिठाया, रिपोर्ट आई जिसने बताया कि देश का मुस्लिम समाज तो अनुसूचित लोगों से भी पिछड़ा है। लेकिन कोई यह नहीं बताता कि मुसलमानों ने भारत पर 1000 साल तक हुकूमत की है, कोई उन्हें शिक्षा और नौकरी से वंचित नहीं कर रहा था जिस प्रकार दलितों को किया गया था तो वे क्यों, कब और कैसे पिछड़ गये ? कहीं शरिया कानून मुस्लिम समाज के विकास में बाधक तो नहीं। यह फ़ैसला स्वयं मुस्लिम समाज, सरकार और न्यायालयों को करना होगा। शरिया कानूनों के कारण यदि मुस्लिम समाज पिछड़ेगा तो देश। 

भारत में सेकुलरवाद का अर्थ है सर्वधर्म समभाव। लेकिन किसी धर्म को मानने वाला दूसरे धर्म के साथ समभाव कैसे रख सकता है। सोचिए यदि कोई व्यक्ति मूर्तिपूजा का घोर विरोधी है तो मूर्तिपूजा करने वालों के प्रति समभाव कैसे रख सकता है। समभाव तभी सम्भव है जब कोई आदमी या तो नास्तिक हो या फिर सभी धर्मों में विश्वास करता हो। ऐसे में धर्म विशेष के लिए पर्सनल लॉ कैसे बन सकता है।

धर्म निन्दा के कानून भी एक समान होने चाहिए। स्वर्गीय एमएफ़ हुसैन ने अपने चित्रों के माध्यम से हिन्दू धर्म पर अक्सर करारी चोट की थी। यदि उन्हें ऐसा करने की आजादी थी तो आहत लोगों को अदालत का दरवाजा खटखटाने की भी आजादी थी। लेकिन एमएफ हुसैन अदालतों से बचने के लिए विदेश चले गए, जहां उनका देहान्त हुआ। अपनी आजादी की सीमाएं समझनी चाहिए और हम सभी को उन सीमाओं का सम्मान करना चाहिए।

यदि आप एक किताब लिखें और उसका नाम तलाशें तो क्या उसका नाम भगवतगीता, बाइबिल या कुरान शरीफ़ रख देंगे, यह जानते हुए भी कि हिन्दू धर्म के मानने वाले भगवत गीता की, इस्लाम के मानने वाले क़ुरान शरीफ़ की और ईसाई धर्म के मानने वाले बाइबिल की इज्जत करते हैं। लेकिन सिनेमा बनाकर उसका नाम रामलीला रखना उचित नहीं है। अनावश्यक विवाद पैदा करने से बचा जा सकता है यदि सभी धर्मों की ईशनिन्दा पर एक समान दंड हो। 

कुछ फिल्मकार अजीब तर्क देते हैं। उनका कहना है कि भारत ऐसा देश है जहां शिवलिंग की पूजा होती है और जहां खजुराहो और दूसरे मन्दिरों में कामुक मूर्तियां बनाने की आजादी थी। यह सच है कि आजादी थी परन्तु उस आजादी का दौलत कमाने के लिए दुरुपयोग नहीं किया गया है। एक पक्ष को अभिव्यक्ति की आजादी के लिए आवश्यक है दूसरे पक्ष की सहनशीलता। इसलिए दोनों पक्षों के बीच में लक्ष्मण रेखा का होना जरूरी है। सहनशीलता को कायरता नहीं समझना चाहिए और कुछ भी कहने या करने के लिए अपने को आजाद न मानें। आजादी सबके लिए समान होनी चाहिए चाहे इबादत का मसला ही क्यों न हो।

कितना अच्छा होता यदि दुनिया में हर जगह मन्दिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरुद्वारा और बौद्ध मठ बनाने की खुले दिल से इजाजत होती जैसे भारत में है। कितना अच्छा होता कि अफ़गानिस्तान में महात्मा बुद्ध की दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति न टूटती, कोणार्क और खजुराहो की मूर्तियां न टूटी होतीं। ऐसी सहनशीलता वहीं सम्भव है जहां मतान्तर का सम्मान होता हो और जहां इंसानियत का लम्बे समय तक विकास हुआ हो। भारत ने विदेशी धर्मों तक के लिए अपना दरवाजा खुला रखा, उनकी पूजा विधियों और पूजा स्थानों का सम्मान किया। यही था सेकुलरवाद ।

पश्चिमी देशों ने मतान्तर को सहज स्वीकार नहीं किया और ईसा मसीह को सूली पर चढ़ना पड़ा। ऐसी विचारधाराओं से विकसित पंथ में अपने से अलग पूजा पद्धतियों को समभाव से कैसे देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए इंग्लैण्ड में धर्मनिन्दा अर्थात ब्लेस्फैमी की सजा तभी मिलती है जब कोई व्यक्ति ईसाई धर्म को अपमानित करता है। किसी मन्दिर अथवा मस्जिद को अपमानित करें तो उस पर यह कानून लागू नहीं होता। अधिकांश ईसाई बहुल देशों में यही स्थिति है।

दुनिया के इस्लामिक देशों में शरिया कानून एक समान लागू नहीं होते। तीन तलाक का नियम सऊदी अरब, इराक, ईरान और यहां तक कि पाकिस्तान में मान्य नहीं है। मैं इस्लामिक देशों में रहा तो नहीं हूं इसलिए कह नहीं सकता कि वहां मन्दिर बनाने, पूजा अर्चना करने, धार्मिक पुस्तकें रखने और इष्टदेव की मूर्ति रखने की आजादी है या नहीं। 

जो भी हो, किसी राज्य अथवा सरकार के लिए पंथनिरपेक्षता या धर्मनिरपेक्षता एक वांछनीय व्यवस्था है। राज्यों से अपेक्षा रहती है कि वे या तो आस्था के विषयों में किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप न करें अथवा सभी के प्रति समभाव रखते हुए सबके साथ एक जैसा व्यवहार करें। यदि कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे तो उसकी अलग समस्याएं होंगी। सरकार को अपना काम तो करना ही होगा।

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