नक्सली और दुर्गम इलाकों में महिलाओं की ताकत बन रहे स्वयं सहायता समूह

झारखंड के नक्सली और दुर्गम इलाकों में रहने वाली महिलाओं की ताकत यहाँ के स्वयं सहायता समूह बन चुके हैं। समूह इनके लिए बचत का ही माध्यम नहीं बल्कि इसे ये रिश्तों की मजबूत डोर मानती हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   29 Oct 2018 10:00 AM GMT

नक्सली और दुर्गम इलाकों में महिलाओं की ताकत बन रहे स्वयं सहायता समूह

रांची(झारखंड)। झारखंड के नक्सल और दुर्गम इलाकों में रहने वाली हजारों महिलाएं स्वयं सहयता समूह को अपनी ताकत मानती हैं। यहाँ पर सास-बहु, ननद-भौजाई, देवरानी-जेठानी के लिए ये समूह केवल बचत का माध्यम नहीं बल्कि ये इसे अपने आपसी रिश्तों का मजबूत बंधन मानती हैं।

रांची से लगभग 300 किलोमीटर दूर शहर की चकाचौंध से कोसों दूर जंगली क्षेत्र पलामू जिले की रहने वाली रीता देवी (35 वर्ष) एक पेड़ की छाँव में बैठी अपने समूह की ताकत बता रही थीं, "इस जंगली क्षेत्र में समूह की दीदियाँ ही हमारी दोस्त हैं। ये हर समय जरूरत पड़ने पर हमारी मदद के लिए तैयार रहती हैं। समूह की बैठक में हम एक दूसरे से अपने सु:ख-दुःख बांटते हैं। हम गोतनी (देवरानी-जेठानी) अगर आपस में लड़ाई करेंगे तो यहाँ हमारी कौन मदद करने आएगा।"

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पलामू जिला मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर दूर जंगली क्षेत्र के सतबरवा ब्लॉक के चरवाडीह गाँव की रहने वाली रीता देवी ने बताया, "लड़ाई वहां ज्यादा होती है जहाँ लोगों के पास ज्यादा काम नहीं रहता। हमारे गाँव में तो कोई खाली ही नहीं रहता। सुबह समूह में जंगल निकल जाते पूरा दिन काम करते ही गुजरता है। परेशानी में समूह की हर दीदी एक दूसरे की मदद के लिए तैयार रहती हैं।"


रीता देवी की तरह झारखंड में लगभग 19 लाख ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं। इनमें से ज्यादातर वो महिलाएं शामिल हैं जो पहाड़ी और जंगली क्षेत्र की रहने वाली हैं। आजीविका मिशन के द्वारा ये समूह पैसों की बचत करने के लिए बनाए गये थे लेकिन अब ये स्वयं सहायता समूह यहाँ की महिलाओं के लिए एक ऐसा ठिकाना है जहाँ ये अपने दिल की बात एक दूसरे से साझा कर पाती हैं।

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झारखंड में ऐसे सैकड़ों गाँव हैं जो पहाड़ी और जंगली क्षेत्रों में बसे हैं जहाँ इनके आसपास कई किलोमीटर तक न तो कोई बड़ा बाजार लगता है और न ही इनके पास मनोरंजन का कोई ऐसा साधन है जिससे ये अपना वक़्त गुजार सकें। जंगली क्षेत्र में एक गाँव से दूसरे गाँव की दूरी भी बहुत ज्यादा है। ऐसी परिस्थितियों में ये शहर की चकाचौंध से कोसों दूर हो जाते हैं। इन हालातों में इन महिलाओं के लिए समूह ही इनके सुख-दुख के साथी होते हैं।



ग्रामीण विकास विभाग के सहयोग से झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के द्वारा ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करने के लिए स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया। राज्य में अबतक लगभग डेढ़ लाख स्वयं सहायता समूह बन चुके हैं जिसमें 96 करोड़ से ज्यादा रुपए जमा हैं। पर सुदूर क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं के लिए ये समूह केवल बचत तक सीमित नहीं रह गये हैं। बल्कि ये समूह उन रिश्तों को भी मजबूत कर रहे हैं जिसमें अकसर लड़ाई-झगड़े की चर्चाएं सुनने को मिलती थी।

नक्सल प्रभावित और पहाड़ी क्षेत्र के अलग-अलग जिले जिसमें पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम,खूँटी, रामगढ़, पलामू की सैकड़ों महिलाओं से बातचीत के दौरान ये निकलकर आया कि इन वीरान क्षेत्रों में समूह ही इनकी ताकत है। इनके लिए स्वयं सहायता समूह एक ऐसा माध्यम बन गया है जहाँ ये न केवल सप्ताह में होने वाली बैठक में पैसे जमा करती हैं बल्कि जब भी किसी को मदद की जरूरत पड़ती है तो ये मिलकर आपस में एक दूसरे की मदद भी करती हैं।



सास-बहू, ननद-भाभी की हंसी-ठिठोली का मंच है स्वयं सहायता समूह

इनमें से कई समूह में सास-बहू, ननद-भाभी, देवरानी-जेठानी जैसे कई रिश्ते एक साथ मीटिंग में बैठक करते हैं, हंसी-ठिठोलियां करते हैं, एक दूसरे की तकलीफ़ों और मुश्किलों को समझते हैं उसका समाधान निकालते हैं। इतना ही नहीं इसमें सरकार की विभिन्न योजनाओं की जानकारी भी मिलती है।

रीता देवी और चन्द्रवती देवी देवरानी और जेठानी हैं। जिनकी दोस्ती और आपसी समझ को देखकर कोई भी इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकता कि देवरानी-जेठानी हैं। चारवाडीह गाँव में लक्ष्मी आजीविका ग्राम संगठन में ऐसे कई समूह हैं जिसमें कई देवरानी-जेठानी आपस एक अच्छे साथी की तरह रहती हैं।

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समूह में जंगल जाती हैं ये महिलाएं

यहाँ की भौगौलिक स्थिति के अनुसार ज्यादातर गाँव जंगल के आसपास हैं। इनकी जीविका ज्यादातर जंगलों पर निर्भर है। इसलिए जंगल में महिलाएं एक साथ समूह में जाती हैं जिससे अगर इन्हें कोई परेशानी हो तो सब मिलकर निपटा सकें।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र पूर्वी सिंहभूम जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर गुड़ाबाँदा क्षेत्र के भालकी गाँव की रहने वाली रेबिका देवी (42 वर्ष) ने बताया, "एक समय था जब हमें घर से निकलने में डर लगता था। जबसे समूह बने हैं तबसे हममे इतनी हिम्मत आ गयी है हम कहीं भी एक साथ आ जा सकते हैं।" रेबिका देवी की तरह हजारों महिलाओं का डर अब खत्म हो गया है।


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