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शौक ने दी बीमारियों को मात

शौक ने दी बीमारियों को मातgaonconnection

कानपुर देहात। पच्चीस साल पहले जिस विजय लक्ष्मी को डॉक्टर ने कई बीमारियां गिना दी थीं और बिस्तर से कभी न उठने की हिदायत दी थी। वहीं विजय लक्ष्मी आज अपने मेहनत के बल पर पूरी तरह से स्वस्थ हैं और दूसरे लोगों के लिए भी प्रेरणा बन रही हैं।

कानपुर देहात जिला मुख्यालय से लगभग 40 किमी. दूर मैथा ब्लॉक के टिकरी गाँव की रहने वाली विजय लक्ष्मी (65 वर्ष) से आस-पास के लोग सीख रहे हैं। साल 1965 में शादी करके आयी तो बड़ा परिवार था। दिनभर का कामकाज निपटाने के बाद रात के अंधेरे में दिए की रोशनी में सिलाई-बुनाई करती थी।

विजयलक्ष्मी बताती हैं, “साल 1990 मे मेरे पति को अटैक पड़ा, मुझे अकेले ही अस्पताल लेकर कानपुर आना पड़ा। एक महीने तक वो हास्पिटल में रहे, उनकी जांच से लेकर दवाइयों तक पूरी देखरेख मुझे ही करनी पड़ी। बहुत मुश्किल था मेरे लिए सबकुछ, मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी। उसी वक़्त मैंने संकल्प लिया था कि चाहे जो कुछ हो जाए मैं अपने बच्चों को खूब पढ़ाऊंगी, जिससे उन्हें मेरी तरह अपमान का घूंट न पीना पड़े।”

विजयलक्ष्मी के सात लड़कियां और दो लड़के हैं। उन्होंने बच्चों को खूब पढ़ाया। आज उनके सभी बच्चे अच्छी नौकरी कर रहे हैं। विजय लक्ष्मी कहती हैं, “मेरे सभी बच्चों में एक बात खास  है कि सरकारी नौकरी के बावजूद सब अपने ढंग से कुछ न कुछ सामाजिक कार्य भी कर रहे हैं।”

विजयलक्ष्मी बच्चों की पढ़ायी के आगे खुद को भूल गईं। ऐसे में उन्हें भी तमाम बीमारियों ने घेर लिया। डॉक्टर को दिखाया तो डॉक्टर ने आराम करने की सलाह दी। उनकी बेटी शिखा सिंह (26 वर्ष) बताती हैं, “मम्मी बिस्तर पर पड़े-पड़े बोर होने लगीं, अपनी ज़िंदगी में कभी आराम नहीं किया था, हम सभी के लाख समझाने के बावजूद मम्मी बैठे ही उन काम को फिर से करने लगीं, जो उन्होंने काफी पहले बंद कर दिये थे।” 

वो आगे कहती हैं, “सिलाई, कढ़ाई, बुनाई सब कुछ करना शुरू कर दिया, कभी दीदी की बेटी के लिए बढ़िया फ्रॉक सिलतीं तो कभी भाई के बेटे के लिए बढ़िया स्वेटर बनातीं, गर्मियों मे खूब सारे डिजायन वाले पंखे बनातीं। अपने मनपसंद काम करने के दौरान वो कुछ महीनों मे ठीक होने लगी।”

गाँव की दूसरी महिलाएं और लड़कियां भी विजय लक्ष्मी से सिलाई-कढ़ाई सीखने आती हैं। उनके गाँव की धन्नो सिंह बताती हैं, “विजय लक्ष्मी जीजी से की तरह हम अपनी बेटियों और बहुओं को भी बनने को कहते हैं। वो लड़कियों को भी अपना हुनर सिखा रही हैं। उसका कोई पैसा भी नहीं लेती हैं।”

नीतू सिंह

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

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