शिक्षकों के वेतन पर दस करोड़ खर्च, संसाधनों पर शून्य

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बागपत। बच्चों को ककहरा आए या न आए, लेकिन शिक्षकों को ठीक समय पर वेतन जरूर मिल जाता है। बात जब बच्चों को संसाधन मुहैया कराने की आती है तो वहां शासन से लेकर अधिकारी तक चुप्पी साध लेते हैं। प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर परिषदीय स्कूलों का माहौल करने के दावे करने वाली सरकार भी बच्चों को संसाधन देने में नाकाम दिख रही है।

अगर बागपत की अगर बात की जाए तो यहां 674 परिषदीय स्कूलों में करीब 2500 शिक्षक बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं, जिनके वेतन पर करीब दस करोड़ रुपए प्रति महीने का खर्च आता है, जबकि बच्चों को स्कूलों में सुविधाओं के लिए तरसना पड़ता है। उन्हें समय पर किताबें तक मुहैया नहीं कराई जाती हैं। जब संसाधन ही मुहैया नहीं होंगे तो परिषदीय स्कूलों में कैसे पढ़ाई का ढर्रा सुधर पाएगा? 

प्राथमिक व उच्च प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए तमाम योजनाएं शुरू की गई हैं। बच्चों को दोपहर का भोजन यानी मिड-डे मील, नि:शुल्क पाठ्य सामग्री, नि:शुल्क शिक्षा, नि:शुल्क ड्रेस मुहैया कराए जाते हैं। यानी कक्षा एक से आठ तक के बच्चों को पढ़ाने में अभिभावकों की जेब पर जरा भी खर्च नहीं है, लेकिन अभिभावक इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे हैं।अधिकांश अभिभावक प्राइवेट स्कूलों पर विश्वास जताते हैं, जबकि प्राइवेट स्कूलों में अनट्रेंड अध्यापकों के हाथ में बच्चों का भविष्य होता है। वहां न बीएड की अनिवार्यता को पूरा किया जाता है और न ही ग्रेजुएशन होना जरूरी है।

प्राइवेट स्कूलों में बहुत कम वेतन पर महिला व पुरुष शिक्षकों की भरमार है, जबकि बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में ट्रेंड अध्यापकों की भर्ती की जाती है। बीएड, बीटीसी, उर्दू बीटीसी, विशिष्ट बीटीसी आदि करने के बाद टीईटी की परीक्षा पास करना अनिवार्य है। जो टीईटी की परीक्षा उत्तीर्ण होगा वही शिक्षक की पात्रता लाइन में माना जाएगा। इतनी प्रक्रियाओं के बाद शिक्षकों को रखा जाता है, लेकिन प्राइवेट स्कूलों में नियमों को ताक पर रखकर कम वेतन देने के लालच में शिक्षकों को तैनात किया जाता है।

भले ही पब्लिक स्कूल में अनट्रेंड शिक्षक हों, लेकिन अभिभावक वहीं बच्चों को भेजना पसंद करते हैं। इसका मुख्य कारण सरकारी स्कूलों में समय पर संसाधन मुहैया न होना है। जर्जर भवनों की मरम्मत सही समय पर नहीं कराई जाती, स्कूल में शौचालयों तक की सुविधा नहीं है, बालक-बालिका के लिए अलग-अलग शौचालय नहीं हैं, पेयजल की समुचित व्यवस्था नहीं है, बच्चों की ड्रेस समय पर उपलब्ध नहीं होती, किताबों को भी समय पर नहीं दिया जाता आदि विभिन्न मामले ऐसे हैं जिनको लेकर अभिभावकों का विश्वास सरकारी स्कूलों से उठ चुका है।

शैक्षिक सत्र आधा बीत जाने पर बच्चों को ड्रेस और किताबें मुहैया कराई जाती हैं, लेकिन प्राइवेट स्कूलों में यह शैक्षिक सत्र के पहले दिन से ही मुहैया हो जाती हैं। भले ही प्राइवेट स्कूल में बच्चों को भारी भरकम फीस देकर पढ़ाना पड़े, लेकिन अभिभावक पीछे नहीं हटते हैं। वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूलों से लगातार अभिभावकों का मोह भंग होता जा रहा है।

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