शुक्र है कि हमें मासिक होता है

शुक्र है कि हमें मासिक होता हैगाँव कनेक्शन

कुछ दिन पहले की खबर है, केरल के एक मंदिर मे पुजारियों ने तकनीक का विशेष ध्यान रखते हुए एक मशीन लगवा दी। मशीन का काम कुछ और नहीं, बस ये ध्यान रखना था कि कहीं भूल से भी वो स्त्रियां मंदिर परिसर में ना प्रवेश पा जाएं जिनके महीने के दिन चल रहे हों।

थोड़ा अजीब लग रहा है, है-ना मंदिर मे घुसने के लिए मशीन से जांच, लेकिन क्या ये सब कुछ नया है हम सब के लिए, शायद नहीं। आप भी तो मानती हैं कि महीने के उस सप्ताह मे आप अपवित्र होती हैं, आपको पूजा-पाठ

नहीं करना चाहिए, यदि आप भी इन परम्पराओं के खिलाफ हैं तो आपकी मां, नानी, दादी, बुआ, काकी, चाची में से कोई तो ज़रूर आपकी बगावत पर क्रोधित होती होंगी और हो भी क्यों ना।

ये तो वर्षों की परंपरा है, मां ने, उनकी माँ ने और उनकी मां ने भी, सब ही तो अपने आप को समेट लेती थीं। चहारदीवारियों मे जकड़ लेती थीं। मर्दों को नहीं छूती थी, पूजा घर के द्वार तक फटकती नहीं थी, उफ जैसे कि कोई सज़ा मिली हो?

लेकिन क्या आप जानती हैं कि मासिक की क्या विशेषता है?

रक्त का ये स्राव पहली बार तब होता है जब आपके जननांग विकसित हो जाते हैं, महिलाओं का मासिक चक्र उनके 'मां' बनने की स्थिति के लिए तैयार हो जाने की भी गवाही देता है, यानी महीने के उन दिनों का सीधा संबद्ध 'संतानोत्पत्ति' से है।

यहां अगर हम धार्मिक विचारधाराओं की ओर भी मुड़ें तो सोलह संस्कारों मे से एक  'विवाह' का भी मुख्य आधार बच्चे का जन्म है और 'मासिक' उस आधार का मुख्य स्तम्भ।

जब समाज की नींव ही महिलाओं के रक्त स्राव से जुड़ी है तो फिर शुचिता-अशुचिता का ये कैसा प्रश्न? क्यों उत्तर भारतीय घरों मे आचार छूना, पूजा करना और रसोई में जाना वर्जित कर दिया जाता है? क्यों नेपाल मे चौपादि के दिनों मे महिलाओं को घर से बाहर झोपड़े मे रहना पड़ता है या फिर दक्षिण भारत में पहले मासिक पर उत्साव होने के बावज़ूद बाकी के महीनों मे ये दिन अंधेरे कमरे मे बिताने पड़ते हैं? क्यों कामख्या मे स्त्रावित देवी की पूजा होती है लेकिन एक स्त्रावित औरत वो पूजा नहीं कर पाती है?

मासिक होना एक नैसर्गिक प्रक्रिया है, जो हमे अपने 'औरत होने' पर गर्व कराती हैं, फिर सिर्फ़ इसकी वज़ह से हम प्रताड़ित क्यों होते रहें, शुक्र है कि हमें मासिक होता है...।

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