समय के साथ बदलता रहा ढोलक का स्वरूप

समय के साथ बदलता रहा ढोलक का स्वरूप

देवां (बाराबंकी)। शादी हो या फिर कोई तीज-त्योहार बिना ढोलक की थाप के पूरा नहीं होता है। गाँवों में एक घर में ढोलक पूरे गाँव के काम आती है। ढोलक का स्वरूप बदलता जा रहा है। पहले जहां डोरी वाली ढोलक बिकती थी, वहीं अब नट-बोल्ट वाली ढोलक ज्यादा बिकती हैं।

बाराबंकी के प्रसिद्ध देवां मेले में रंग-बिरंगी ढोलक बेचने वाले अमरोहा जिले के नइमउद्दीन अमरोही ग्राहकों को ढोलक बजा-बजाकर अपनी तरफ बुलाते हैं। नइमउद्दीन अमरोही (45) बताते हैं, ''हमारे तो दादा-परदादा के समय से यही काम होता आ रहा है, अब लड़के यही काम करते आ रहे हैं।"

ढोलक आम, शीशम, सागौन या नीम की लकड़ी से बनाई जाती है। लकड़ी को पोला करके दोनों मुखों पर बकरे की खाल डोरियों से कसी रहती है। डोरी में छल्ले रहते हैं, जो ढोलक का स्वर मिलाने में काम आते हैं। सूत की रस्सी के द्वारा इसको खींचकर कसा जाता है। अब धीरे-धीरे ढोलक का स्वरूप भी बदल रहा है, अब सूत की रस्सियों की जगह नट-बोल्ट लगी ढोलक भी खूब बिकती है।

ढोलक बेचने वाले आलम रजा बताते हैं, ''यहां के बाद मिश्रिख मेले उसके बाद बहराइच के सईद सलाम मेले में जाएंगे।"

ढोलक के बदलते स्वरूप के बारे में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत विभाग के प्रोफेसर पंकज राय बताते हैं, ''अगर पेशेवर ढोलक वादक की बात की जाए तो वो रस्सी वाली ढोलक ही बजाते हैं, क्योकि जो संगीत रस्सी वाली ढोलक में आता है वो नट-बोल्ट वाली ढोलक में नहीं आता है।"

देवां में ढोलक बेचने वाले नइमउद्दीन की कई पीढिय़ां ढोलक बनाने के साथ ही बेचने का काम करती आ रही है। ये लोग ढोलक के साथ ही तबला, नगाड़ा जैसी चीजें भी बनाते हैं। अमरोहा की मशहूर ढोलक राजस्थान, मध्यप्रदेश, पंजाब जैसे दूसरे प्रदेशों में भी खूब बिकती है। 

देवां मेले मेें ढोलक खरीदने आयी बाराबंकी जिले के देवां ब्लॉक के तिंदोला गाँव की कुसुम देवी कई ढोलक को बजा-बजाकर देखती हैं। कुसुम देवी (40) बताती हैं, ''शादी-विवाह हो या कोई कार्यक्रम बिना ढोलक के सब सूना लगता है।" 

अमरोहा जिले की नयी बस्ती गाँव ढोलक के लिए जाना जाता है। यहां के ज्यादातर लोग ढोलक बनाने और बेचने का काम करते हैं। 

इतिहास

ढोलक गायन व नृत्य के साथ बजाई जाने वाला एक प्रमुख वाद्य यन्त्र है। पुराने समय में ढोलक का प्रयोग पूजा, प्रार्थना और नृत्य गान में ही नहीं बल्कि दुश्मनों पर प्रहार, खूंखार जानवरों को भगाने, चेतावनी देने के लिए प्रयोग किया जाता था। ढोल, जातीय संगीत मंडली, नृत्यगान, जश्न और श्रम प्रतियोगिता में ताल व उत्साहपूर्ण वातावरण बनाने के लिए ढोल का सहारा लिया जाता है। ढोल में आवाज के लिए ऊपरी व निचली दोनों तरफ जानवर की खाल लगाई जाती है। इसका खोल आम या फिर शीशम की लकड़ी का होता है। गाँवों में फाग नृत्यों में इनका विशेष उपयोग होते हैं। आम तौर लोक नृत्य गान और लोकप्रिय संगीतों में उसका ज़्यादा प्रयोग किया जाता है।

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