संगम में खुशियां बेचता बचपन

संगम में खुशियां बेचता बचपनगाँव कनेक्शन, इलाहाबाद

इलाहाबाद। माघ मेले में संगम के किनारे लाखों की भीड़ रोज लगती है, दूर दराज से लोग संगम में स्नान कर अपने पापों को धोने आते हैं, मां गंगा की आरती कर उनका आशीर्वाद लेने आते है और गंगा में पैसे का चढ़ावा चढ़ाते हैं। उसी संगम में उन्ही चढ़ावे के पैसे के तलाश में छोटे-छोटे बच्चे जिनकी उम्र सात से बारह साल की होती है वे दिनभर पानी में रह कर इस कड़ाके की ठंड में चुंबक के सहारे उन्ही पैसे की तलाशा करते हैं। इसी उम्र के कुछ बच्चे फूल बेचते हैं तो कुछ दूध बेचते है। हमारे देश में छह साल से 14 साल तक के बच्चे को पढ़ने का अधिकार मिला है पर संगम के किनारे इन बच्चों को देख कर ये सारे अधिकार खोखले लगते हैं।   

इन बच्चों में से ज्यादातर बच्चे जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर गंगा पार झूंसी के पास के निबी गाँव के हैं, गोपाल (9 वर्ष) एक छोटे से चुंबक को रस्सी में बांध कर बार-बार गंगा में फेंक रहा है इस उम्मींद से की शायद कोई सिक्का चिपक जाये। जब हमने उससे पूछा की स्कूल क्यों नहीं जाते हो तो गोपाल ने कहा, ''आज-कल हम लोगों का स्कूल बंद है क्योंकि सारे बच्चे यहां एक महीने के लिए कमाई करने चले आये हैं। हमारे घरवाले ही हमें ये करने के लिए भेजते हैं।" जिस नन्हीं उम्र में गोपाल के हाथों में खिलौने होने चाहिए, कंधों पर किताबों से भरे बैग का बोझ होना चाहिए, उस उम्र में वह कड़ाके की ठंड में घर की जिम्मेदारियों का बोझ उठा रहा है।

अमित (11 वर्ष) भी निबी गाँव का है वो यहां पर फूल बेचता है, अमित बताता है, ''गाँव में रहने से कोई मतलब नहीं है, पापा भी यहीं चले आते है कुछ काम करने और मैं भी पापा के साथ यहां आ जाता हूं। पापा मुझे फूल खरीद कर दे देते है मैं दिनभर उन्हें बेचकर करीब 80 से 100 रुपए तक कमा लेता हूं, घर में पैसे देता हूं।" मेले में पक्षियों का दाना बेचता पप्पू (9 वर्ष) बताता है, ''मेरे पापा ने मुझे लइया और सेव खरीद कर दे दिया और इसे जहां खूब सारे पक्षी दिख रहे हैं वहां बेचने के लिए कहा है। मैं रोज जहां-जहां पक्षी होते हैं वहां मैं दाना बेचता हूं, जिससे दिनभर 100 से 150 रुपए कमा लेता हूं जो मुझसे पापा ले लेते हैं।"

आज कल के लोग सोशल मीडिया पर बहुत सी बातें करते हैं, चाइल्ड लेबर के बारे में। वास्तविकता में ये सारी बातें सिर्फ सोशल मीडिया में धरी की धरी रह जाती हैं, इनका असल जीवन में कहीं कोई रूप नहीं है। अमित, पप्पू और गोपाल जैसे बहुत से बच्चे यहां माघ मेला में अपना पेट पाल रहे है। कोई फूल तो कोई चिड़ियों का दाना बेच कर संगम किनारे अपनी खुशियां बेच रहे हैं। ये उम्र इनके खेलने, खाने और पढ़ने की है कमाने की नहीं।

रिपोर्टिंग - आकाश द्विवेदी

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