संस्कृत को रोजगार से जोड़ना होगा

संस्कृत को रोजगार से जोड़ना होगाgaoconnection

मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने केन्द्रीय विद्यालयों में कक्षा 6 से 8 तक त्रिभाषा सूत्र के अन्तर्गत तीसरी भाषा के रूप में जर्मन की जगह संस्कृत को पढ़ाए जाने का आदेश दिया है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने इस वर्ष जर्मन को लागू रखने का आदेश पारित किया है इसलिए अगले साल से संस्कृत लागू हो सकेगी। त्रिभाषा सूत्र में हिंदी और अंग्रेजी के अलावा एक अन्य भारतीय भाषा को लिया जाना है परन्तु जर्मन को भारतीय भाषा मानकर त्रिभाषा सूत्र में डालना तर्कसंगत नहीं है।

देश में जहां अंग्रेजी का वर्चस्व है, संस्कृत की नींव तभी लाभकर हो सकती है जब भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत का उपयोग बढ़े और रोजी-रोटी का साधन बने। यदि संस्कृत केवल पंडित और पुरोहित का काम दिलाएगी तो ज्यादा अपेक्षा नहीं कर सकते। हम मैकाले को गालियां दे सकते हैं परन्तु भारत में अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार में मैकाले का बहुत बड़ा योगदान है। लोग अंग्रेजी की तरफ दौड़ते हैं क्योंकि उसे पढ़ने से नौकरी मिलती है। गाँवों में भी लोग आजकल अंग्रेजी की कोचिंग पढ़ते हैं। यदि संस्कृत पढ़ने से नौकरियां मिलने लगें तो हर जाति धर्म के लोग इसे पढ़ेंगे। जर्मन, जापानी, फ्रांसीसी, चीनी और इजराइल की हेब्रू जैसी भाषाओं को लोग पढ़ते हैं क्योंकि इन भाषाओं ने अपने देशों में रोजगार दिया है। 

संस्कृत के प्रति नौजवानों का रुझान सिर्फ इसलिए नहीं बढ़ेगा कि इसमें भगवतगीता, रामायण, महाभारत और उपनिषदों का संदेश विद्यमान है। इसलिए भी नहीं बढ़ेगा कि महात्मा गांधी, तिलक और गोखले ने संस्कृत में लिखी भगवतगीता के महत्व को समझा और उसकी व्याख्या लिखी। मंदिरों में या धार्मिक अनुष्ठानों के समय मंत्रोच्चार भी उन्हें संस्कृत पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं कर सकेगा।

संस्कृत के प्रति आकर्षण तभी बढ़ेगा जब यह अतीत की नहीं, भविष्य की भाषा बनेगी। अनेक पश्चिमी वैज्ञानिक मानते हैं कि संस्कृत में कम्प्यूटर भाषा बनने की क्षमता है लेकिन भारत में किसी ने इस दिशा में कोई रिसर्च नहीं की है। एमिस रिसर्च सेन्टर कैलिफोर्निया के रिक ब्रिग्गस ने एक रिसर्च पेपर ‘‘संस्कृत एंड आर्टिफिशियल इन्टेलीजेन्स-नासा” में कहा है कि संस्कृत को एक मशीनी भाषा के रूप में प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि, इसके वाक्यों में शब्दों का क्रम बंधा नहीं है। प्रत्येक शब्द अपने में पूर्ण है और दुविधारहित है।

अमृता इनोवाटीव टेक्नाेलॉजी प्रयोगशाला में भी इस सम्भावना पर काम चल रहा है कि संस्कृत को कम्प्यूटर भाषा के रूप में प्रयोग किया जा सकता है या नहीं। यदि संस्कृत को कम्प्यूटर भाषा के रूप में मान्यता मिल जाए तो संस्कृत जानने वालों के लिए रोजगार के असीमित अवसर मिल जाएंगे। यदि योग और आयुर्वेद की श्रेष्ठता प्रमाणित हो सकेगी तो विदेशों में भी संस्कृत जानने वालों की मांग बढ़ेगी। गाँवों में पंडित और पुरोहित का काम अशिक्षित और अर्धशिक्षित लोग उसी प्रकार कर रहे हैं जैसे झोलाछाप डॉक्टर इलाज कर रहे हैं। यदि हजारों अस्पतालों में योग विभाग खोल दिये जाएं और नए-नए आयुर्वेदिक कॉलेज खोले जाएं तो संस्कृत जानने वालों की बहुत बड़ी मांग होगी।

योग और आयुर्वेद को अनेक पश्चिमी अस्पतालों में महत्व मिल रहा है। संस्कृत के बिना हमारे देश को विवेकानन्द और शंकराचार्य नहीं मिल सकते थे जो विश्व में भारत की आवाज बनें। विज्ञान के क्षेत्र में भी कौन नहीं जानता बोधायन, भास्कराचार्य, सुश्रुत, चरक, आर्यभट्ट के योगदान को। सुश्रुत को तो प्लास्टिक सर्जरी का पिता माना जाता है। 

इन तथ्यों को हमसे बेहतर तो मैक्सम्युलर, रोमेन रोलैंड और एएल बाशम जानते हैं जिनहोंने संस्कृत के महत्व को दुनिया के सामने रखा है। यह हमारी गुलाम मानसिकता है कि हम प्रत्येक अच्छी बात को पश्चिम से होते हुए आने से मान लेते हैं। हम तो यह भी मान बैठे थे कि आर्य पश्चिम से आए थे। भला हो उन वैज्ञानिकों का जिन्होंने बायोटेक्नाेलॉजी में जीन्स के आधार पर प्रमाणित किया कि आर्य बाहर से नहीं आए थे। उनका मूल यहीं है।

संस्कृत वह सशक्त माध्यम रहा है जिसके द्वारा अतीत में अथाह ज्ञान विविध विषयों में सृजित किया गया था जो आज भी उपलब्ध है। भूविज्ञान, मनोविज्ञान, दर्शन शास्त्र, सामाजिक व्यवहार आदि पर संस्कृत में उपलब्ध ज्ञान को मान्यता इसलिए नहीं मिलती क्योंकि हमारे अपने लोग ही इसे नहीं जानते। हमें संस्कृत के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा।

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