79 साल बाद जागा द्रविड़नाडु का जिन्न, पढ़िए क्यों भारत के इन 4 राज्यों में उठी अलग देश की मांग

79 साल बाद जागा द्रविड़नाडु का जिन्न, पढ़िए क्यों भारत के इन 4 राज्यों में उठी  अलग देश की मांगचार राज्यों के लोग कर रहे अलग देश की मांग।

नई दिल्ली। भारत से आजादी की मांग एक बार फिर उठ रही है। 79 साल बाद द्रविड़नाड़ु देश की कल्पना अचानक से जीवित हो उठी। दक्षिण भारत के चार राज्यों के कुछ लोग भारत से आजादी की मांग कर रहे हैं।

दरअसल द्रविड़नाडु शब्द सोमवार (29 मई ) को सुबह से ही टि्वटर पर ट्रेंड कर रहा था। तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक के लोग पहले भी अलग देश की मांग कर चुके हैं। लोगों का कहना है कि अगर मोदी सरकार लोगों के खान-पान और अन्य सांस्कृतिक मामलों में हस्तक्षेप करती है तो फिर हमें इस देश से अलग कर दिया जाए। दक्षिण भारत के लोगों का कहना है कि अगर ब्राह्मणवादी परम्पराओं से देश चलाना है तो हमें आजाद कर दो। द्रविडनाडु शब्द और द्रविड़नाडु राज्य की मांग वैसे तो पेरियार रामास्वामी नायकर ने की थी।

प्रधानमंत्री मोदी पर साधा जा रहा निशाना।

अगर द्रविडनाडु की जड़ में जाएं तो साल 1916 में टीएम नायर और राव बहादुर त्यागराज चेट्टी ने जस्टिस पार्टी बनाई। इस पार्टी ने साल 1921 में स्थानीय चुनावों में जीत हासिल की। सीएन मुदलिआर, सर पीटी चेट्टी और डॉटी एम नायर की मेहनत से ये संगठन एक राजनीतिक पार्टी बन गई।

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जस्टिस पार्टी सन् 1920 से लेकर सन् 1937 तक मद्रास प्रेसीडेंसी में सत्ता में रही, पर 1944 में ईवी रामास्वामी यानी पेरियार ने जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर 'द्रविड़ कड़गम' कर दिया। ये उस समय ग़ैर राजनीतिक पार्टी थी, जिसने पहली बार द्रविड़नाडु (द्रविड़ों का देश) बनाने की मांग रखी थी। यहीं से द्रविडनाडु के लिए जो आंदोलन खड़ा हुआ, उसने भारत देश के अंदर उत्तर भारतीय आर्यों से अलग दक्षिण भारतीय द्रविड़ों के लिए द्रविड़नाडु की मांग रखी।

1940 में जस्टिस पार्टी ने द्रविड़नाडु की मांग को लेकर रिजोल्यूशन पास किया। द्रविड़नाडु के लिए जून 1940 में एक नक्शा पेरियार ने कांचीपुरम में जारी किया, जिसमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम यानी द्रविड़भाषी परिवारों के लिए अलग देश की मांग थी।

ये मांग 40 से 60 के दशक में पूरी तरह से चली, साथ ही जब अंग्रेजी की जगह हिंदी को मातृभाषा के तौर पर अपनाने की अंतिम प्रक्रिया चली, तो द्रविड़ों का आंदोलन उग्र हो गया। हजारों लोगों ने जेल की राह चुनी, तो कईयों ने आंदोलन के दौरान ही जान दे दी। यहां नेहरू की समझबूझ कहें कि अंग्रेजी को लेकर उनकी सोच ने हिंदी की राह कठिन भले की, पर इससे देश के टुकड़े होते-होते बच गए। ये तो रही इतिहास की बात। लेकिन अब मोदी राज में एक बार फिर ये शब्द चर्चा में क्यों है।

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अचानक से क्यों ट्रेंड होने लगा द्रविड़नाडु

अगर टि्वटर की बात करें तो दक्षिण भारत के लोग मोदी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार पर ब्राह्मणवाद को भी फैलाने का आरोप लगा रहे हैं। अगर हम टि्वट पर नजरें दौड़ाएं तो ये कुछ प्रमुख कारण हैं जिस कारण ये मांग फिर उठने लगी है-

  1. पहला कारण ये है कि मोदी सरकार लोगों के खान-पान को निर्देशित कर रही है। दक्षिण भारत में बीफ खाया जाता है और जबकि उत्तर भारत में ये प्रमुख भाजपा के लोग इसे चुनावी मुद्दा बना रहे हैं।
  2. दूसरा कारण ये भी है कि दक्षिण भारत के लोग जस्टिस कर्णन को अपमानित करने के मामले में भी उत्तर भारतीय जजों के रवैये से दुखी हैं। उनका मानना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले जस्टिस कर्णन को उत्तर भारत के जजों ने परेशान किया।
  3. तीसरा मामला जंतर-मंतर पर आंदोलन करने वाले तमिल किसानों से जुड़ा है। दक्षिण भारत के लोगों में ये संदेश जा रहा है कि पेरियार के आंदोलन से खफा होने वाले उत्तर भारत के लोगों ने जानबुझकर तमिल किसानों की मांगों को नजरअंदाज किया।

सोशल मीडिया पर लोग मोदी सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि मोदी सरकार ने देश को नेहरू युग में पहुंचा दिया है। 1947 में भारत को एक रखना बड़ी चुनौती थी। सारे राज्य अपना अलग देश बना सकते थे। पर सरदार पटेल के प्रयासों से देश एकजुट रहा। अब एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं कि क्या मोदी पूरे देश को एकसाथ ले चलने में सक्षम नहीं हैं।

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