दिल्ली की देहरी में पढ़िए कैसी थी रस्किन बॉन्ड की दिल्ली

दिल्ली की देहरी में पढ़िए कैसी थी रस्किन बॉन्ड की दिल्लीरस्किन बॉन्ड की दिल्ली

प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक रस्किन बॉन्ड ने अपने लिखे गद्य साहित्य में आजादी से पहले अंग्रेजों की नई दिल्ली, पुरानी दिल्ली और भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान से उजड़कर आए हिन्दू-सिख शरणार्थी आबादी से बसी बाहरी दिल्ली के इलाके सहित तत्कालीन जनजीवन और समाज का प्रमाणिक वर्णन किया है।

रस्किन तब की नई दिल्ली के स्वरूप का बखान करते हुए बताते हैं कि 1943 में नई दिल्ली अभी भी एक छोटी जगह थी। मेडिंस, स्विस जैसे बड़े होटल पुरानी दिल्ली में ही थे। सड़कों पर केवल कुछ कारें ही दिखती थी। सैनिकों सहित अधिकतर लोग घोड़े जुते तांगे से सफर करते थे। जब हम रेल पकड़ने के लिए स्टेशन गए तो हमने भी तांगा लिया। नहीं तो वैसे हम पैदल ही जाते थे।

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उन्होंने अपनी पुस्तक ‘सीन्स फ्रॉम ए राइटर्स लाइफ’ (पेंगुइन से प्रकाशित) में बचपन में पहली बार दिल्ली आने का वर्णन करते हुए लिखा है कि जब कालका-दिल्ली एक्सप्रेस दिल्ली में दाखिल हुई, तब मेरे पिता (रेल) प्लेटफ़ॉर्म पर अपनी (रॉयल एयर फोर्स) की वर्दी में बेहद चुस्त लग रहे थे और उन्हें स्वाभाविक रूप से मुझे देखकर काफी खुशी हुई।

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दिल्ली में अपने पिता के घर के बारे में वे बताते हैं कि उन्होंने कनॉट सर्कस के सामने एक अपार्टमेंट वाली इमारत सिंधिया हाउस में एक फ्लैट ले लिया था। यह मुझे पूरी तरह से माफिक था क्योंकि यहां से कुछ ही मिनटों की दूरी पर सिनेमा घर, किताबों की दुकानें और रेस्तरां थे। सड़क के ठीक सामने एक नया मिल्क बार (दूध की दुकान) था। जब मेरे पिता अपने दफ्तर गए होते थे तो मैं कभी-कभी वहां स्ट्रॉबेरी, चॉकलेट या वेनिला का मिल्कशेक पी आता था। वही एक अखबार की दुकान से घर के लिए एक कॉमिक पेपर भी खरीदता था।

रस्किन बॉन्ड अपने पिता की संगत में दिल्ली में फ़िल्में देखने के अनुभव को साझा करते हुए बताते हैं कि वे सभी शानदार नए सिनेमाघर आसानी से पहुंच के भीतर थे और मेरे पिता और मैं जल्द ही नियमित रूप से सिनेमा जाने वाले दर्शक बन गए। हमने एक हफ्ते में कम से कम तीन फिल्में तो देखी ही होंगी।

उनके शब्दों में, पिता के डाक टिकटों के संग्रह की देख-रेख, उनके साथ फिल्में देखना, वेंगर्स में चाय के साथ मफिन खाना, किताब या रिकार्ड खरीदकर घर लाना, भला एक आठ साल के छोटे-से बच्चे के लिए इससे ज्यादा क्या खुशी की बात हो सकती थी?

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इतना ही नहीं, रस्किन ने उस ज़माने की पैदल सैर के बारे में भी लिखा है। पुस्तक के अनुसार, उन दिनों में आपको नई दिल्ली से बाहर जाने और आसपास के खेतों में या झाड़ वाले जंगल तक पहुंचने के लिए थोड़ा-बहुत ही चलना पड़ता था। हुमायूँ का मकबरा बबूल और कीकर के पेड़ों से घिरा हुआ था, और नई राजधानी के घेरे में मौजूद दूसरे पुराने मकबरों और स्मारकों का भी यही हाल था।

मेरे पिता ने निर्जन पुराना किला में मुझे हुमायूं के पुस्तकालय से नीचे आने वाली तंग सीढ़ियां दिखाई। यही बादशाह की फिसलकर गिरने के कारण मौत हुई थी। हुमायूं का मकबरा भी ज्यादा दूर नहीं था। आज वे सभी नई आवासीय क्षेत्रों और सरकारी कॉलोनियों से घिर गए हैं और शोरगुल वाले यातायात को देखना सुनना एक अद्भुत अनुभव है।

इसी तरह बाहरी दिल्ली के बारे में सुनने में यह बात भले ही अजीब लगे पर सच यही है कि दिल्ली के राजौरी गार्डन में कभी कोई गार्डन नहीं था। रस्किन बांड ने अपनी आत्मकथा “लोन फॉक्स डांसिंग” (प्रकाशक:स्पीकिंग टाइगर) ने इस बात की ताकीद की है। उनके ही शब्दों में, “हम (मेरी मां, सौतेले पिता, भाई और बहन) तब की नई दिल्ली के सबसे दूसरे किनारे यानी नजफगढ़ रोड पर राजौरी गार्डन नामक एक शरणार्थी कॉलोनी में रह रहे थे। यह 1959 का समय था जब राजौरी गार्डन में पश्चिमी पंजाब के हिस्सों, जो कि अब पाकिस्तान है, से उजड़कर आए हिंदू और सिख शरणार्थियों के बनाए छोटे घर भर थे। यह कोई कहने की बात नहीं है कि यहां कोई गार्डन यानी बाग नहीं थे।”

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आत्मकथा के अनुसार, हरियाणा और राजस्थान के गर्म-धूल भरी हवाओं से इस पेड़विहीन कॉलोनी की हालत खराब थी। यहां आकर रहने वाले शरणार्थियों को भारत में नए सिरे से जमने, काम शुरू करने या छोटे मोटे धंधों को खड़ा करने में काफी मेहनत करनी पड़ी। ऐसे में, उनके पास फूलों के लिए समय नहीं था और बाहरी लोगों के लिए और भी कम लेकिन उनमें से कुछ ने अपने घरों के कुछ हिस्सों को किराए पर दे दिया।

रस्किन बताते हैं कि कम किराए के उस समय में, मेरे सौतेले पिता ने (राजौरी गार्डन में) तीन कमरे का एक घर किराए पर लिया, जिसमें एक छोटा आंगन और एक हैंडपंप भी था। उस हैंडपंप ने समूचा फर्क पैदा किया क्योंकि दिल्ली में पानी हमेशा से एक समस्या थी (और आज भी है)। हैंडपंप का पानी साफ था, जिसे खाना बनाने, कपड़े धोने-नहाने और उबलाकर पीने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता था। मुझे पानी या खाने के कारण पेट की परेशानी (किसी दूसरे को ऐसी समस्या नहीं थी) नहीं थी, वह तो सीधे सीधे असंतोष और निराशा थी।

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उस समय के आस-पास की हरियाली के माहौल का वर्णन करते हुए रस्किन बॉन्ड कहते हैं कि मुझे राजौरी गार्डन के नजदीक और अधिक बेहतर दृश्य दिखाई दिए। नजफगढ़ रोड की एक तरफ यह घर बने हुए थे। दूसरी तरफ, अभी तक आबादी की बसावट न होने के कारण गेहूं और दूसरी फसलों के बड़े खेत थे जो कि पश्चिम और उत्तर की दिशा की ओर तक फैले हुए थे। मैं मुख्य सड़क को पार करके खेतों में जाकर पुराने कुएं-सिंचाई की नहरें खोजने चला जाता था। जहां पर मैं यदा-कदा दिखने वाले बिजूका सहित पक्षियों और छोटे जीवों को निहारता था, जिनका बसेरा अब शहर से बाहर था।

नजफगढ़ रोड से कुछ नीचे जाने वाले रास्ते पर गांव का एक बड़ा तालाब था और इसके पास एक भव्य बरगद का पेड़ था। इस तरह का पेड़ आपको किसी भी शहर में नहीं मिलेगा क्योंकि स्वस्थ बरगदों को अपनी डाल-टहनियों के फैलाव और सहजता से पनपने के लिए काफी स्थान की आवश्यकता होती है। मैंने इससे बड़ा बरगद कभी नहीं देखा था और मुझे यह बात बहुत अच्छे से पता चल चुकी थी। उसकी सैकड़ों टहनियां तनों को सहारा दिए हुए थी और उनके ऊपर पत्तों का एक विशाल मुकुट सरीखी छतरी थी।

ऐसी कहावत है कि एक पुराने बरगद की छाया में पूरी सेना आश्रय ले सकती हैं और शायद एक समय में उन्होंने ऐसा किया भी। यहां मुझे एक अलग तरह की सेना दिखाई दी। इसमें मैना, स्कील, बुलबुल, गुच्छेदार चिड़ियों सहित दूसरे अनेक पक्षी थे जो कि पेड़ पर लाल अंजीरों को खाने के लिए एक साथ जुटते थे। इस पेड़ की छाल पर गिलहरियां ऊपर-नीचे उछलती कूदती रहती तो कभी दमभर सांस लेने के लिए पल भर रूकती। रंगीले तोते पेड़ पर आते जाते चिल्लाहट मचाए रखते क्योंकि उनको ऐसा ही करना होता था।

उसके और आगे जाकर एक बड़ी झील थी। यहां कोई भी बबूल या कीकर के पेड़ की छांव में आराम करते हुए कौडिल्ली पक्षी को पानी में गोता लगाकर छोटी मछलियों का शिकार करते हुए देख सकता था। मैं इन खूबसूरत पक्षियों में से एक को पेड़ की लटकने वाली टहनी या चट्टान पर धैर्य से बैठकर प्रतीक्षा करते और फिर पानी में तीर की गति से गोता मारकर अपने शिकार को पकड़ने के बाद वापिस अपने स्थान पर लौटता देखता।

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