आग में झुलसी इस विदेशी महिला की कहानी, जो दूसरों की मदद करने आई है भारत

आग में झुलसी इस विदेशी महिला की कहानी, जो दूसरों की मदद करने आई है भारतजब वो दो साल की थी तब वो उसकी कार में आग लग गई थी।

कभी खाना बनाते वक्त या किसी दूसरी वजह से अगर शरीर का कोई हिस्सा ज़रा सा भी जल जाता है तो हालत ख़राब हो जाती है तो सोचिए उनका क्या होता होगा जिनका पूरा शरीर ही जल जाता है। हमारे देश में हर साल न जाने कितने लोग खुद को आग लगाकर आत्महत्या कर लेते हैं, न जाने कितनी बहुओं को दहेज के लालच में जलाकर मार दिया जाता है, कई लोग किसी हादसे से भी आग में जल जाते हैं। आग में जलने की तकलीफ को लगभग हर कोई समझ सकता है।

आग में जलने की ऐसी ही एक घटना इस विदेशी महिला के साथ हुई। जब वो दो साल की थी तब उसकी कार में आग लग गई थी। इस हादसे में उसकी बहन की मौत हो गई और ये महिला बुरी तरह जल गई। इस हादसे के बाद उसकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई, उसे तमाम तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा लेकिन अब ये महिला भारत आई है, आग में झुलसी हुई महिलाओं की मदद करने। इस महिला का नाम क्या है और ये कहां से है ये तो नहीं पता लेकिन इसने फेसबुक पेज ह्युमंस ऑफ बॉम्बे पर एक मैसेज लिखा और अपनी पूरी कहानी बयां की है। साथ ही उसने लोगों से मदद भी मांगी है...

पढ़ें पूरी पोस्ट -

जब मैं दो साल की थी तब मैं और मेरी बहन कार में बैठे हुए थे। कार की खिड़की खुली थी और मेरी मां कुछ मिनट पहले ही एक ग्रॉसरी स्टोर में सामान लेने गई थीं। इन कुछ मिनटो में मेरी ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। किसी अनजान कारण से मेरी कार में आग लग गई। मैं और मेरी बहन लपटों में घिरे हुए थे। मेरी बहन अमांडा की इस आग में झुलस कर मर गई, मैं बुरी तरह जल गई और कोमा में चली गई। अगले कुछ साल मेरे परिवार के लिए काफी डरावने थे क्योंकि वे मुझे दर्द में बड़ा होता हुआ देख रहे थे। जब मैं दो साल की थी तब से जब तक 20 साल की हो गई तब तक लगातार मेरी कई सर्जरी हुईं। मैंने अपने हाथों को खो दिया और फिर कुछ सर्जरी की मदद से मेरी उंगलिया दोबारा बनाई गईं। जलने की निशानों की वजह से मेरी त्वचा में खिंचाव खत्म हो गया था, इसलिए जब मैं बड़ी हो रही थी तो मुझे अधिक त्वचा की ज़रूरत थी।

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एक दिन जब मैं स्कूल में थी तब मेरे कुछ दोस्त फुटबॉल खेल रहे थे, मेरा बहुत मन था कि मैं भी उनके साथ खेलूं लेकिन मेरे स्कूल वालों ने मुझे कहा कि मैं बेंच पर ही बैठी रहूं क्योंकि उन्हें लगता था कि मुझे जल्दी चोट लग सकती है। मुझसे अलग तरह का व्यवहार किया जाता था और मुझे इससे नफरत थी।

मेरी मां ने मुझे रात भर रोते हुए देखा और वह अगले दिन वह अधिकारियों से इसके बारे में बात करने गईं। उन्होंने मेरे लिए समान अधिकारों की मांग की और अगले दिन मुझे गोलकीपर बना दिया गया। मैंने एक गोल होने से रोक लिया और उस समय मेरी पूरी टीम ने मुझे गले लगा लिया। इसके बाद मैंने कभी अपनी शरीर की बनावट को अपने रास्ते में नहीं आने दिया। मैंने कानून में डिग्री ली और लीगल असिस्टेंट के तौर पर काम करना शुरू कर दिया।

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इसी समय के बीच में मेरी शादी हो गई और मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी मेरे दो बेटे मुझे मिले। जब मैं 28 साल की थी तब मेरी शादी टूट गई और मैं सिंगल मदर बन गई। मैंने अपने बेटों को पालने के लिए कड़ी मेहनत की। इन सालों में मैं कई आग में जलकर बचे हुए लोगों से मिली और इनसे मुझे प्यार मिला निशान नहीं। मैंने कुछ रिसर्च की और मैं आग में जलकर बचने वाले लोगों की कहानियां पढ़कर शॉक्ड थी। इनके साथ दुर्व्यवहार हुआ था, उन्हें ठीक से चिकित्सकीय सहायता नहीं मिली थी, कानूनी सलाह नहीं मिली थी। इनमें से कई की आंखों की रोशनी चली गई थी, कुछ का चेहरा बुरी तरह जल गया था कुछ के कई अंग ख़राब हो गए थे। इसके बाद मैं चर्च गई और मैंने 1000 पाउंड इन लोगों की मदद के लिए दिए। मैंने अपने दोनों बच्चों को अपनी मां के पास छोड़ दिया, भारत के लिए फ्लाइट पकड़ी और यहां आकर अपनी पूरी ताक़त इन लोगों की ज़िंदगी के लिए झोंक दी।

मैंने इन लोगों को देखा और महसूस किया कि उनके साथ कितना ग़लत हुआ था। मेरे साथ जो हुआ वो एक हादसा था लेकिन ऐसे कई लोग थे जिनके साथ अपराध हुआ था और उनके अपराधी को सजा भी नहीं मिली थी। मैं हमेशा से एक पेशेवर वकील बनना चाहती थी लेकिन भारत आने के बाद मेरी ये ख्वाहिश और बढ़ गई। मैं इन महिलाओं को न्याय दिलाना चाहती हूं और मुझे पता है कि मैं ये कर सकती हूं।

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क्योंकि मैं एक एकल मां हूं इसलिए मैं अपनी पढ़ाई का पूरा खर्च नहीं उठा सकती और अपनी कमाई को भी पूरी तरह नहीं खर्च कर सकती। मैं पहले ही बेलफार्ड यूनिवर्सिटी में पंजीकरण करा चुकी हूं लेकिन मुझे यहां से ड्रॉप करना पड़ा क्योंकि मेरी बचत मैं पहले ही ख़त्म हो चुकी थी और मैं अपनी फीस नहीं भर पाई। मैं अपने इस सपने को पूरा करने के लिए अब और कोशिश कर रही हूं और मुझे इसमें आपकी मदद चाहिए।

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