29 की उम्र में हो गए थे 90 प्रतिशत पैरालाइज्ड, आज दुनिया भर के लोगों को दे रहे सहारा

29 की उम्र में हो गए थे 90 प्रतिशत पैरालाइज्ड, आज दुनिया भर के लोगों को दे रहे सहारागिरीश गोगिया

लखनऊ। कई बार ज़िंदगी आपको ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है कि आपको लगता है कि अब खुद को खत्म कर लेना चाहिए। कई लोग ऐसे होते भी हैं जो हालातों से डरकर जान दे देते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो कुछ तो हालातों से लड़ते ही हैं, दूसरों के लिए भी मिसाल कायम करते हैं। ऐसे ही एक शख्स की ये कहानी है, 29 साल की उम्र में जिनका शरीर 90 प्रतिशत पैरालाइज्ड हो गया था।

गर्दन से नीचे के हिस्से को अपनी मर्जी से हिला डुला भी नहीं सकते थे लेकिन इन्होंने हार नहीं मानी। आज ये कई लोगों को उनके हालातों से लड़ना सिखा रहे हैं। इनका नाम है गिरीश गोगिया। इनकी कहानी लोगों को खूब भा रही है। फेसबुक पेज ह्यूमंस ऑफ बॉम्बे पर इनकी कहानी शेयर की गई है, जो वायरल हो रही है। अब तक 5,400 शेयर हो चुके हैं। 28 हज़ार लोग इनकी कहानी को लाइक कर चुके हैं और 1300 लोग इस पर कमेंट कर चुके हैं। आप भी पढ़िए इनकी कहानी –

"29 साल की उम्र से पहले मैं लगभग 40 देशो में घूम चुका था। मुझे घूमने, साहसिक खेलों का बहुत शौक था लेकिन जो मुझे सबसे ज्यादा पसंद था वह था क्लिफ डाइविंग। नीला पानी मुझे अपनी ओर बुलाता था और हर बार जब भी मैं उसमें कूदता था, मुझे सम्पूर्णता महसूस होती थी। गोवा में एक क्लिफ डाइविंग करते समय मैंने पानी की गहराई को गलत आंक लिया और मेरा सिर पानी के अंदर एक पत्थर से टकरा गया जिससे मेरी गर्दन की हड्डी टूट गई। मैं 90 प्रतिशत पैरालाइज्ड हो गया था। गर्दन से नीचे के हिस्से पर मेरा कोई कंट्रोल नहीं था।

ऐसा लग रहा था जैसे मुझे अंधेरे में धकेल दिया गया हो। स्थिति और भी ज्यादा बुरी हो गई जब डॉक्टर ने मुझसे कहा कि मैं अब कभी सही नहीं हो सकता और हमेशा ऐसा ही रहूंगा। मुझे आज भी उनके शब्द याद हैं, आपकी इस स्थिति के लिए कोई इलाज़ नहीं है, आप अपनी पूरी ज़िदंगी में ऐसे ही रहेंगे। यहां तक कि पहले पांच बेड सोर्स जो आपको हुए हैं, वो भी ठीक नहीं हो पाएंगे। मैं गहरे अवसाद में चला गया था। मैं इस सब को खत्म करना चाहता था, मरना चाहता था लेकिन कुछ हफ्तों के बाद मेरे साथ कुछ अजीब सा घटित हुआ।

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मेरे दिमाग ने बिजली सी तेज़ गति से काम करना शुरू कर दिया और अंदर से आवाज़ आई कि मैं डॉक्टर के फैसले को नहीं मानूंगा, मैं लड़ूंगा। मैंने खुद को भरोसा दिलाया, अपने दिमाग को मज़बूत बनाया और अपने एक्सीडेंट के आठ महीने के अंदर मैं फिर से तैयार था। मैंने अपने इंटीरियर डिज़ाइनिंग के बिजनेस को दोबारा शुरू किया और ऐसे प्रोजेक्ट्स को लेना शुरू किया जो चुनौतीपूर्ण और उत्तेजक होते थे। इसी व्हीलचेयर से मैंने मुंबई सेंट्रल और चर्चगेट स्टेशनों में सुधार की प्रक्रिया शुरू की।

एक समय में मैं अपनी जगह से हिले बिना सैकड़ों कर्मचारियों को कंट्रोल कर रहा था। अगले 15 सालों तक मुझे इस काम में सफलता मिलती रही। इस बीच में मैं कई ऐसे लोगों से मिला जो मुझसे पूछते थे कि आप इतना सकारात्मक कैसे रहते हैं। मैं हर उम्र के लोगों से मिला, ऐसे लोगों से जो अवसाद में थे और खुद को खत्म करना चाहते थे। यही वह समय था जब मैंने अपने द्देश्य और मेरे साथ जो हुआ था उसका वास्तविक मतलब समझा। मुझे समझ आया कि मुझे यहां मेरी यात्रा साझा करने के लिए भेजा गया ताकि मैं लोगों को यह समझा सकूं कि मनुष्य की आत्मा, उसके साथ जो कुछ भी हुआ, उससे ज्यादा मज़बूत होती है।

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मैंने अपना बिजनेस बंद कर दिया और लोगों को अवसाद से निकलने में उनकी मदद करना शुरू कर दिया। मैं दुनिया की यात्रा करना शुरू कर दिया, अपनी कहानी दूसरों को बताने के लिए और उन्हें ये समझाने के लिए वो भी खुद की मदद कर सकते हैं, खुद को ठीक कर सकते हैं, उनमें वो शक्ति है। मुझे ये शक्ति हर दिन मिलती है और मैं जिंदगी के प्रति आभारी हूं, मुझे अपनी ज़िंदगी से प्यार है। मेरा संदेश सरल है और वह है जो मैं चाहता हूं कि आप हाइलाइट करें - समाधान आपके अंदर है। जो आपके अंदर है और आपके पीछे है वह सब थोड़े महत्व का है, आप इसकी तुलना उससे करिए जो आपके अंदर है। मैं इस बात में बहुत विश्वास करता हूं कि जब आप किसी चीज़ को पाने की कोशिश करते हैं तो कायनात आपको वो चीज़ ज़रूर देता है। अगली बार आपको जब भी लगे कि आप खुद को खत्म करना चाहते हैं तो एक लंबी सांस लें और खुद को यह याद दिलाएं कि आप बहुत कीमती हैं, आपके अंदर शक्ति है और आप बहुत खुशनसीब हैं कि आप ज़िंदा हैं।"

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