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फेसबुक पोस्ट : सरकार किसानों पर अघोषित ‘जजिया’ कर लगा रही ? 

फेसबुक पोस्ट : सरकार किसानों पर अघोषित ‘जजिया’ कर लगा रही ? प्रतीकात्मक तस्वीर

ट्रैक्टर किसान के हाथ पैर हैं। वो खेती के अलावा अपने तमाम दूसरे काम इसी से करते हैं। वैसे तो ट्रैक्टर कृषि कार्य के लिए होते हैं, लेकिन किसानों के निजी व्यवसायिक कार्य इससे हो सकते हैं। यूपी के लखीमपुर में ट्रैक्टर-ट्राली वाले किसान का जुर्माना काटने पर एक पत्रकार ने ये पोस्ट लिखी है

हद जो गई मनमानी की। अब आपको तफ्सील से बताते हैं... कल मेरे एक किसान मित्र की ट्राली ट्रैक्टर पकड़ ली गई। उनके साथ एक और एक किसान की ट्राली थी। बेचारे घर बनाने को बालू ले कर जा रहे थे। बमुश्किल जोड़-तोड़ के एक बरामदा बनाने के लिए पैसे का जुगाड़ कर पाए थे। उनका फोन आया दादा इधर बालू नहीं मिल रही। हमने पता किया। बेडनापुर में बालू मिल गई। चार-चार हज़ार की रॉयल्टी कटवा दोनों बालू ले अपने घर जा रहे थे। रामापुर के आगे किसी वर्दी धारी ने पकड़ लिया। मेरे पास फोन आया। पता लगाते-लगाते लगा कि एआरटीओ ने ट्राली पकड़ी है।

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बात हुई। पर साहब की दो टूक, ई-चालान का हवाला दिया गया। सरकार की सख्ती का फरमान भी सुनाया गया। चलिए यहां तक तो ठीक था। अब क्या हो पर जवाब मिला जुर्माना लगेगा। जब जुर्माने का पता चला तो दोनों किसानों का दिल हलक में आ गया। लेटे पेटे 35-38 हजार रुपए एक ट्राली का। जुर्म बताया गया कामर्शियल काम कर रहे। खैर बरसात में एक बड़े किसान से भी 35-40 हजार का जुर्माना क्या वाजिब है? क्या किसी पजेरो या फार्च्यूनर वाले जो इनके सीने को रौंदते आगे निकल जाते उनसे कभी एआरटीओ या परिवहन विभाग ने 40000 का जुर्माना लिया।

खुद प्रेशर हॉर्न लगा क्या किसानों के सीने पर ही मूंग दलेंगे आप। सब ठीक है। किसानों को आपने कभी बताया कि उनकी ट्राली का रजिस्ट्रेशन होना चाहिए। कभी बताइए कि अपने लिए भी ईंट ले जाने को कमर्शियल रजिस्ट्रेशन चाहिए। किसी बड़े आदमी की जी हुजूरी करने वाले मोटे मोटे ब्रेसलेट पहने ठेकेदारों के तलवे चाटने वाले अफसरों को क्या किसान ही सबसे कमजोर लगते हैं। सरकारी महकमे सरकार की सख्ती किसानों पर इस तरह थोपेंगे क्या? क्या अपने काम के लिए भी किसान को कामर्शियल लाइसेंस लेना होगा? सरकार जजिया कर लगाएगी क्या? अरे सरकार आम आदमी की 'हाय' बहुत बुरी होती है,किसानों की तो बहुत ही...जिले के जनप्रतिनिधि भी माफ नहीं किए जाएँगे।

इस पोस्ट के कुछ देर बाद प्रशांत पांडेय ने एक और पोस्ट लिखी है

सवा चार बीघा खेत का मालिक वो किसान खेत बेंचने के चक्कर मे घूम रहा। 4 हजार बालू की रॉयल्टी देकर घर बालू ले जा रहा था। अब 40 हजार का जुर्माना कैसे भरे। दिन भर आरटीओ आफिस के चक्कर लगा के थक गया। फोन आया। भरे गले से बोला भैया भइया या तो ट्रैक्टर बिकवा दो या एक बीघा जमीन। न हो आप ही ले लो। दिल फट गया कसम से...नाम लिखना ठीक नहीं पर बड़ा हंसमुख। किसी काम को न करने वाला उस हंसमुख किसान को मैंने कभी इतना तनाव में नहीं देखा। गला भरा था। आंसू बस छलके पड़ रहे थे,किसी तरह रोके ही था वो। किस्तों पर ट्रैक्टर लिया है उसने। अभी फाइनेंसर ने कागज तक नहीं दिए। भोलेभाले किसान किस तरह अपनी रोनी रोटी चला रहे ये चौपहियों पर चलने वाले अफसरों को कब समझ आएगी। एआरटीओ साहब ने ई चालान नहीं काटा उसकी जिंदगी का पर्चा काट दिया हो। छटपटाता घूम रहा था। उसके पास हजार रुपये भी नहीं थे। उस किसान की मनोस्थिति कोई नहीं समझ सकता। उसके चेहरे के भाव देखे नहीं जा रहे थे। जैसे पानी के बिना मछली तड़पती है,वैसे अपने ट्रैक्टर के लिए तड़प रहा हो जैसे। आज समझा बुझाकर किसी तरह घर भेजा उसे...यथा सम्भव मदद का भरोसा भी दिया है...मंगलवार को देखते हैं...पर सरकार से एक अनुरोध है कम से कम गरीब किसानों पर ऐसे अंग्रेजों के माफिक आर्थिक चाबुक न चले तो ठीक है...किसान वैसे भी टूटा हुआ है...और कितना तोड़ेंगे...बाबा.

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प्रशांत पांडेय, टीवी पत्रकार और किसान हैं, लखीमपुरखीरी, यूपी में रहते हैं। य़े उनकी फेसबुक पोस्ट है।

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