ब्लॉग : सिर्फ चुनाव में रोशन होता है ये गाँव

ब्लॉग : सिर्फ चुनाव में रोशन होता है ये गाँवबरुआसागर क़स्बे का खिरक खोजना गाँव

बरुआसागर छोटा सा क़स्बा है। बेतवा नदी से भरने वाले झीलनुमा तालाब और झरने के लिए प्रसिद्ध रहा है। अदरक की खेती के लिए भी ये इलाका ख़ास माना जाता है। इस कस्बे से महज़ एक किलोमीटर दूर गाँव खिरक खोजना है। आबादी यही कोई एक हज़ार के आसपास है। कुछ मकानों पर खपरैल है। कई पक्के हैं। अधिकतर की छतों पर डिश एंटीना है। छतरी लगी हुई हैं। सड़क बनी है। घुसते ही एक कुआं है। गाँव से सटकर ही छोटी सी नहर निकली है। हल्की बारिश से मिट्टी महक रही है। पेड़ हरे-भरे हैं। घर अलग अलग रंगों से पेंट किये गये हैं। मतलब काफी कुछ उन गाँवों की तरह जिनकी तस्वीर हम बचपन में अपनी ड्राइंग शीट पर उकेर कर कल्पना करते थे।

गाँव में आने का मकसद बताने पर लोग एकत्रित होने लगते हैं। इस भीड़ में 80 साल तक के बुजुर्ग, महिलायें, युवा लड़के-लड़कियों सहित करीब 100 लोग हैं। घूंघट डाले सुनीता मेरे सामने हैं। सवाल करने पर बोलना शुरू करती हैं। बकौल सुनीता- ‘एक बच्चे की माँ हूँ। शादी से पहले अगर पता होता कि गाँव में बिजली नहीं है तो कभी शादी नहीं करती।’ मेरे लिए खबर/स्टोरी और त्रासदी की शुरुआत सुनीता के इन्हीं शब्दों से होती है।

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वह कहती हैं- ज़िन्दगी में अँधेरा छाया है। रात भर बच्चे और पति पर बिजना झलती (हाथ से बना कपड़े का पंखा) हैं। यही हमारा धर्म है। यहाँ की महिलायें नींद दिन में पूरी करती हैं। करीब 6 साल का एक बच्चा भी लंगड़ाते हुए हमारी ओर बढ़ रहा है। पूछने पर वह टीवी के बारे में नहीं बता पाता। जिस दौर में जन्म लेने के चार-छ महीने बाद बच्चों की गोद में स्मार्ट फ़ोन डाल दिए जाते हैं। लैपटॉप सामने रख दिया जाता है, उस दौर में इस बच्चे ने स्मार्ट फ़ोन देखा भी नहीं।

75 साल की रामकली ने बताया कि उन्होंने क्या उनके पूर्वजों ने भी बिजली नहीं देखी। वह जो बताती हैं वह बेहद चौंकाने वाला है। बिजली के कारण कई युवाओं की शादी नहीं हो रही। वह बताती हैं कि बिजली नहीं होने के कारण कुछ दिन पहले ही गाँव के पिंटू की पत्नी ने तलाक ले लिया है। दोनों की कुछ समय पहले ही शादी हुई थी, लेकिन वह यहाँ नहींं रह पायी। इसके साथ ही एक और नव-विवाहिता यह कहते हुए मायके चली गयी कि जब लाइट आ जायेगी तभी वह आएँगी।

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कई लोग अपनी बात ढंग से नहीं कह पा रहे। दो लड़कियां सामने आकर तेज़ आवाज़ के साथ बोलती हैं। पूजा कुशवाहा गाँव की एक मात्र ऐसी लड़की है जो ग्रेजुएशन कर रही है। गाँव में दसवीं, बारहवीं करने वाले भी एक दो ही हैं। अधिकतर युवा सातवीं-आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ चुके हैं। पता नहीं यह कितना सही है लेकिन दोष बिजली को दे रहे हैं। पूजा कहती है- ‘ग्रेजुएशन तक का सफ़र उन्होंने अँधेरे में तय किया है। बोर्ड एग्ज़ाम आते हैं तो बिजली नहीं काटने के आदेश दिए जाते हैं ताकि बच्चे पढ़ सकें। उन्हें तो बिजली की रौशानी में पढ़ाई का मौका ही नहीं मिला। ठीक से तैयारी नहीं कर पाने से परसेंटेज बहुत कम है।’

डिश/छतरी और सीताराम के साथ ही कई घरों में रखे टेलीविज़न चौंका रहे हैं। सीताराम बताते हैं कि बिजली नहीं है लेकिन टीवी पंखे लगे हैं। इसके पीछे जो घटनाएं वह बताते हैं दरअसल वही राजनीति का अंधकार है। वह कहते हैं कि हमारे साथ धोखा होता है। पिछली बार प्रधानी के चुनाव होने थे। एक प्रत्याशी ने गाँव में बिजली के तार पहुंचा दिए। अस्थाई पोल लगाकर पहुंचाए गये तारों से पहुंची बिजली से गाँव रोशन हो गया। लोगों ने खुश होकर वोट दिए। प्रत्याशी जीत गया। परिणाम घोषित होने के कुछ दिन बाद ही तार हटा लिए गये। जबकि कहा गया था कि मीटर बाद में लग जायेंगे और अब गाँव से बिजली कभी नहीं जायेगी। ऐसा ही 2014 लोकसभा चुनाव में भी हुआ। लोगों ने इस बीच टीवी पंखे सजा लिए। अधिकतर ने गाँव में पहली बार टीवी देखी थी, लेकिन यह ख़ुशी 25-30 दिन ही कायम रह पायी।

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भागीरथ बताते हैं कि नयी शादियों में मिलने वाले टीवी पंखा आदि रखे-रखे कबाड़ बन रहा है। बिजली नहीं होने से इस्तेमाल नहीं हो पाता। चार्जिंग की समस्या के कारण गाँव में लोग स्मार्ट फ़ोन नहीं रखते। छोटे-छोटे फोन रखते हैं जिनकी बैटरी तीन चार दिन चल सके। ये फ़ोन भी कसबे या शहर जाकर किसी परिचित या दुकान वाले के यहाँ पांच-दस रुपये किराया देकर चार्ज कराते हैं। इस गाँव की दहलीज से देखें तो डिजिटल इंडिया का सपना बड़ा कठिन लगता है। ऐसे में कैसे करेंगे। पता नहीं। नेता या ईश्वर ही जानें।

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बाबूलाल कहते हैं कि राजनैतिक लोगों के कारण ये हाल है। वोट मांगते समय बड़े-बड़े वादे करते हैं और बाद में नेता गायब हो जाते हैं। वह बताते हैं कि कुछ दिन पहले ही इलाके के विधायक राजीव सिंह पारीछा पास के कस्बे में सम्मान कराने आये। उनके पास सम्मान का समय है, लेकिन गाँव की इस समस्या के लिए नहीं। वह बताते हैं कि सपा, बसपा, कांग्रेस, बीजेपी सभी दलों के नेता वोट के समय आते हैं। सपा के राज्यसभा सांसद चंद्रपाल सिंह यादव के साथ ही केंद्रीय मंत्री उमा भारती का भी नाम लेते हैं। झाँसी से सांसद उमा भारती से भी लोग गुस्से में हैं। उन्होंने बिजली पहुँचाने का आश्वासन दिया था, फिर पलट कर नहीं आयीं।

मैंने इलाके के विधायक राजीव सिंह पारीछा को फ़ोन किया। वह कहते हैं कि गाँव की समस्या उनके संज्ञान में आयी है। वह इसके लिए प्रयास करेंगे। आप गाँव का नाम-पता उन्हें मैसेज कर दें। फ़ोन कट गया। वोट के समय देहरी-दर-देहरी जाने वाले जनप्रतिनिधि जीत या हार के बाद गाँव के नाम भी भूल जाते हैं। गाँव में एक कहावत है कि चुनाव के समय नेता लोगों के पैर देखकर ही उनके नाम बता देते हैं। (इतने पाँव छूते हैं)

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डीएम कर्ण सिंह चौहान ने फ़ोन पर वही कहा जो विधायक ने कहा। उन्होंने भी एक झटके में गाँव का नाम-पता मैसेज करने को कहा। हालांकि गाँव वाले कहते हैं कि इन सभी को समस्या के बारे में पता है। गाँव के लोग कई बार प्रार्थना पत्र देने के लिए इनके चक्कर लगा चुके हैं। बीजेपी नेता चन्द्रभान राय दावा करते हैं बीजेपी ने जंगलों में भी बिजली पहुंचाई है।

ऐसे में यहाँ बिजली का नहीं होना शर्मनाक है। वह जल्द ही गाँव जायेंगे और प्रयास शुरू करेंगे। केंद्र की योजना के तहत यहाँ बिजली पहुंचाई जायेगी। बीजेपी ने अब तक कितने गाँवों में बिजली पहुंचाई। कितने गाँव चमक उठे। इससे पहले कांग्रेस ने क्या-क्या किया, यहाँ ये आंकड़े का मतलब समझ नहीं आ रहा। दावों पर नहीं जाना चाहता। गाँव की हकीकत सामने है।

जिस समय मैं ये लिख रहा हूँ, उससे पहले तक आपको शायद अंदाज़ा नहीं होगा कि शहर से महज़ 20 किलोमीटर दूरी पर स्थित एक गाँव महज बिजली के ही कारण नहीं बल्कि राजनीति और वोटों के कारण अंधकार में चला गया है। बच्चे पढ़ते नहीं। महिलायें तलाक ले रही हैं। बिजली गृह क्लेश का कारण बनी है। दरअसल, यह राजनीति का अंधकार है। इस अंधकार के लिए आप, मैं, और गाँव के लोग गुहार लगा सकते हैं। चिल्ला सकते हैं। आलोचना कर सकते हैं, लेकिन क्या इसे आसानी से मिटा सकते हैं। अगर ये हमारे अधिकार में है तो लोकतंत्र के इतने दशकों बाद भी मैं, आप और गाँव असहाय क्यों हैं।

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