वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी को पढ़िए- तीन तलाक़ और नयी सोशल इंजीनियरिंग

वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी को पढ़िए- तीन तलाक़ और नयी सोशल इंजीनियरिंगप्रतीकात्मक तस्वीर

तीन तलाक़ पर फ़ैसले के बाद क्या अब एक नयी सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत होगी? और अगर ऐसा हुआ तो क्या देश की राजनीति में हम एक नया मोड़ देखेंगे? ठीक वैसे ही जैसे मंडल के बाद दलित-पिछड़ा राजनीति के बिलकुल नये समीकरण देखे गये थे। हालाँकि पिछले तीन साल में संघ-बीजेपी की जवाबी सोशल इंजीनियरिंग ने दलित-पिछड़ा राजनीति की तसवीर नाटकीय ढंग से बदल दी है। मंडल-पश्चात उभरी राजनीति के सभी धुरन्धर क्षत्रप आज या तो श्री-विहीन हो कर हाशिए पर आ गये हैं या फिर बीजेपी के कोल्हू में जुत कर परिक्रमा-रत हैं।

कैसे बदला मंडल राजनीति का गोलपोस्ट?

आप नोटिस कीजिए कि मंडल-पश्चात राजनीति का नाभिक तो अब भी वही दलित-पिछड़ा धुरी है, लेकिन संघ ने कितनी सफ़ाई से उसकी अन्दरूनी आणविक संरचना बदल कर कैसे उसका गोलपोस्ट बदल दिया। नीतिश कुमार समेत तमाम पिछड़ी जातियों के ज़्यादातर मन्सबदार आज बीजेपी के पाले में हैं। और अभी-अभी पिछड़ी जातियों को अलग-अलग उपवर्गों में विभाजित करने की नयी पहल मोदी सरकार ने की है। यक़ीनन यह अच्छा क़दम है और इसकी ज़रूरत भी थी। लेकिन यह वाक़ई 'चतुर' राजनीति है, जो अगले कुछ वर्षों में जातीय क्षत्रपों को बस प्यादों में बदल देगी और उनमें से किसी का ऐसा असर नहीं बचेगा, जो बीजेपी के लिए ज़रा भी ख़तरा बन सके। तो अब आप बात के एक सिरे पर पहुँच ही गये होंगे कि देश में चल रही नयी सोशल इंजीनियरिंग का यह पहला भाग है, जो पिछड़ों में चलायी जा रही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी हाल में दलित कितनी बड़ी संख्या में बीजेपी को वोट दे चुके हैं, यह हम देख ही चुके हैं।

अब क्या होगी नयी सोशल इंजीनयरिंग?

अब तीन तलाक़ के बाद जिस सोशल इंजीनियरिंग की सम्भावना की चर्चा मैंने छेड़ी है, उसका पहला चरण 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद ही शुरू हो गया था। इसमें हमने 'घर-वापसी', 'लव जिहाद', मुसलमानों की बढ़ती आबादी का हौवा, गो-रक्षा के नाम पर नये क़ानून, उत्पात, धर-पकड़ और उन्मादी हत्याएँ देखीं, भारत माता की जय और छद्म राष्ट्रवाद की हुँकार देखी, क़ब्रिस्तान और श्मशान, ईद और दीवाली पर बिजली की तुलनाएँ देखीं, हल्दीघाटी का नया इतिहास देखा। कुल मिला कर इस पहले चरण में हिन्दुओं के दिमाग़ों में मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर घोलने की कोशिश की गयी। अब तीन तलाक़ के बाद इस सोशल इंजीनियरिंग के दूसरे चरण में मामला थोड़ा अलग है। अब एक तरफ़ मुसलिम महिला है, जो बड़ी सहानुभूति की पात्र है और बीजेपी उनकी सबसे बड़ी हितैषी है, तो दूसरी तरफ़ खलनायक हैं उलेमा, मुसलिम पुरुष और मुसलिम पर्सनल लॉ, जिन्हें 'सुधारा जाना' ज़रूरी बताया जा रहा है।

तीन तलाक़ में बीजेपी की इतनी दिलचस्पी क्यों?

यह सही है तीन तलाक़ की कुप्रथा को किसी भी तरह से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता और सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फ़ैसला मुसलिम महिलाओं की बड़ी भारी जीत है, जो बरसों से इसके ख़िलाफ़ संघर्षरत थीं। लेकिन क्या वजह थी कि तीन तलाक़ के मामले के सुप्रीम कोर्ट में उठते ही बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे हाथोंहाथ लपक लिया। उत्तर प्रदेश के चुनाव में तीन तलाक़ को भी उछाला गया और अभी इसी अप्रैल में भुवनेश्वर में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नरेन्द्र मोदी ने बीजेपी कार्यकर्ताओं को सलाह दी कि वह उन मुसलिम महिलाओं की मदद करें, जो तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ लड़ना चाहती हैं।

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आख़िर तीन तलाक़ में बीजेपी की इतनी दिलचस्पी क्यों? और इसके लिए मुसलिम महिलाओं को एकजुट कर उन्हें गोलबन्द करने का अभियान चलाने की ज़रूरत क्यों? नतीजा सामने है। तीन तलाक़ पर बीजेपी ने सारे राजनीतिक दलों की बोलती ही बन्द कर दी। फ़ैसले के बाद देश भर में मुसलिम महिलाओं में जो ज़बर्दस्त जोश और आत्मविश्वास दिखा, उसने सारे विपक्ष को, मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड और तमाम मुसलिम उलेमा को भारी दबाव में ला दिया।

मुसलिम समाज में सेंध की कोशिश

दूसरी बात यह कि तीन तलाक़ के अपने इस सफल प्रयोग के बाद बीजेपी (और पर्दे के पीछे संघ) यह उम्मीद कर सकती है कि मुसलिम महिलाओं से जुड़े कुछ और मुद्दे उठा कर वह मुसलिम महिलाओं में एक नयी वर्गीय चेतना को पैना कर मुसलिम समाज में सेंध लगाने की कोशिश करे। शिया और सुन्नी विभाजन का दोहन तो बीजेपी पहले से ही करती रही है। अभी हाल में ही बाबरी मसजिद पर सुप्रीम कोर्ट में शिया समुदाय ने अपना नया दावा ठोक कर बता ही दिया कि शिया किस तरह बीजेपी की गोद में खेल रहे हैं! तो बीजेपी या यों कहें कि संघ की रणनीति साफ़ है कि मुसलिम समाज में विभिन्न वर्गीय समूहों को एक-दूसरे के बरअक्स खड़ा कर नयी सोशल इंजीनियरिंग की जाये। मुसलिम महिलाओं से जुड़े मुद्दे उठा कर यह काम थोड़ा आसान हो जाता है।

एक तीर, कई शिकार!

इसीलिए जमाअत-ए-उलेमा-ए-हिन्द काफ़ी चिन्तित है। अपने ताज़ा बयान में उसने आशंका ज़ाहिर की है कि अब आगे 'निकाह हलाला' और बहुविवाह जैसे मुद्दे उछाले जायेंगे। जमाअत का यह डर ग़लत नहीं है। क्योंकि इस तरह के मुद्दे अगर उछलते हैं, तो बीजेपी (यानी कि संघ) के लिए यह एक तीर से कई शिकार करनेवाली बात होगी। पहली यही कि इस बहाने वह अपने को मुसलिम महिलाओं की सच्ची हमदर्द के तौर पर पेश कर उनका दिल जीतने की कोशिश करेगी। दूसरी यह कि इससे 'निकाह हलाला' जैसी प्रतिगामी प्रथा की पैरोकारी करनेवालों, ख़ास कर कट्टरपंथी उलेमा और मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठनों के ख़िलाफ़ माहौल बनेगा।

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तीसरी बात यह कि आवाज़ अगर मुसलिम महिलाओं की तरफ़ से उठेगी तो उन विपक्षी दलों के पास कहने को कुछ नहीं रह जायेगा, जो पर्सनल लॉ में सुधारों से अब तक यह कह कर कन्नी काटते रहे हैं कि ऐसे सुधारों की पहल ख़ुद धार्मिक समूहों के भीतर से होनी चाहिए। और चौथी बात यह कि उस विराट हिन्दू जनमत में बीजेपी को इसके लिए समर्थन भी मिलेगा और वाहवाही भी, जिसके मन में यह बात बैठा दी गयी है कि मुसलमान अपने धर्म के नाम पर न यूनिफ़ार्म सिविल कोड मानना चाहते हैं, न वन्दे मातरम गाना चाहते हैं, न भारत माता की जय बोलना चाहते हैं।

'निकाह हलाला', बहुविवाह और यूनिफ़ार्म सिविल कोड

तो अब सोशल इंजीनियरिंग के अगले दौर में 'निकाह हलाला', बहुविवाह और यूनिफ़ार्म सिविल कोड जैसे और भी कई मुद्दे उछलते रहेंगे। इसमें कोई शक नहीं कि 'निकाह हलाला' और 'बहुविवाह' जैसी प्रथाएँ बन्द होनी चाहिए, और अच्छा तो यह हो कि मुसलिम उलेमा ख़ुद इन सुधारों की पहल करें। लेकिन वह ऐसा करेंगे नहीं और बीजेपी को मौक़ा देते रहेंगे कि वह इन सुधारों के लिए अभियान चलाती रहे।

इसी तरह एक सेकुलर देश में यूनिफ़ार्म सिविल कोड मानने में भी किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यूनिफ़ार्म सिविल कोड पर विधि आयोग अगले साल अपनी रिपोर्ट दे देगा। हालाँकि ऐसे किसी कोड को बना पाना और लागू कर पाना तो अभी बहुत दूर की बात है। केवल मुसलमान ही नहीं, बल्कि हिन्दू, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैनियों, विभिन्न आदिवासी समूहों और पहाड़ी अँचलों में ऐसी बहुत-सी प्रथाएँ और नियम हैं, जिन्हें छोड़ने या बदलने के लिए वह आसानी से तैयार नहीं होंगे।

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लेकिन फ़िलहाल न बीजेपी को, न संघ को यूनिफ़ार्म सिविल कोड की कोई जल्दी है। उसका काम तो इसी से बन जाता है कि हिन्दू मन की चिन्ताओं के केन्द्र में किस प्रकार मुसलमान और मुसलमानों से जुड़े मुद्दों, विवादों को लगातार बनाये रखा जाये, और कैसे मुसलिम समाज को अलग-अलग वर्ग समूहों में बाँट-बँटा कर उलेमा के वर्चस्व को ध्वस्त कर दिया जाय और इन मुद्दों की ऐसी पैकेजिंग कैसे की जाय कि विपक्ष के पास उस पर आपत्ति करने के कोई तर्क न रह जायें और वह राजनीतिक विमर्श के भी हाशिये पर चला जाये। पिछड़ों की सोशल इंजीनियरिंग के बाद अब इस मुसलिम सोशल इंजीनियरिंग का नतीजा क्या होगा? क्या भविष्य के कैनवास पर आपको सब जगह संघ और बीजेपी के अलावा कोई और रंग दिखता है?

और हाँ, इसे महज़ 2019 या 2024 के चुनावी चश्मे से ही न देखिए। चुनावों में हिन्दू वोटों का और फ़ायदा मिल जाय तो अच्छा, कुछ और मुसलिम वोट मिल जाएँ तो और भी अच्छा। लेकिन मामला चुनावी समीकरणों का नहीं है, बल्कि बात उससे कहीं आगे की है। संघ बहुत दूर का ख़ाका तय करके चलता है।

(वरिष्ठ पत्रकार क़मीर वहीद नक़वी की वेबसाइट रागदेश से साभार)

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