सरकारी अनाज पर राशन माफ़िया की नज़र, मंडी में बिक रहा है गरीबों का अनाज

सरकारी अनाज पर राशन माफ़िया की नज़र, मंडी में बिक रहा है गरीबों का अनाजgaon connection, गाँव कनेक्शन

सुनील तनेजा

मेरठ। एक मार्च से ही उत्तर प्रदेश के सभी 75 ज़िलों में खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू हो गया है। बावजूद इसके यूपी के मेरठ ज़िले में अभी भी लोगों को सस्ता राशन नहीं मिल रहा है और इसकी वजह है राशन की कालाबाज़ारी।

मेरठ में एक जनवरी से ही तीन रुपये किलो चावल और दो रुपये किलो गेहूं देने के वादे किए जा रहे हैं। लेकिन दो महीने बाद भी गरीबों को सस्ता राशन नहीं मिल पाया है। दरअसल ये अनाज भी उन्हीं कोटेदारों के जरिए बांटे जाते हैं जिनपर कालाबाज़ारी के आरोप लगते रहे हैं।

गाँव कनेक्शन ने अपनी पड़ताल में पाया है कि तमाम सरकारी कोशिशों के बावजूद गरीबों तक सस्ता अनाज अभी भी नहीं पहुंच रहा है। स्थानीय कोटेदारों के मुताबिक़ खाद्य सुरक्षा लागू होने के बावजूद सरकारी सस्ते गल्लों की दुकानों से लेकर आला अधिकारियों के बीच राशन की कालाबाज़ारी को लेकर सांठगांठ जारी है।

कालाबाज़ारी पर लगाम की सरकारी कोशिशें जारी

सरकार की ओर से सस्ते राशन की कालाबाज़ारी रोकने के लिए कई कोशिशें भी की गई हैं, मसलन कोटेदारों को मिलने वाले राशन की निगरानी और राशनकार्ड धारकों को फोन करके सीधे उनसे मिलने वाले अनाज का ब्यौरा मांगना। लेकिन इन तमाम सरकारी कोशिशों का भी ख़ास फायदा नहीं मिल रहा है।

अपर आयुक्त, खाद्य एवं रसद विभाग रवींद्र कुमार कहते हैं, "अगर कहीं राशन वितरण में अनियमितता बरती जा रही है तो उसकी जांच कराई जाएगी, और आरोपी अधिकारियों और कोटेदारों पर भी कार्रवाई  की जाएगी। मेरठ से कोई शिकायत नहीं मिली है अभी तक फिर भी डीएम से इसकी रिपोर्ट मांगी जाएगी। कार्डधारक सीधे विभाग में अनाज, तेल, राशन न मिलने की शिकायत कर सकते हैं।"

कोटेदार संगठन के पूर्व पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "खाद्य सुरक्षा अधिनियम योजना शुरू होने के बाद हालात और बिगड़े हैं। हमें गेहूं, चावल और मिट्टी के तेल पर प्रति किलो और प्रति लीटर 70 पैसे का कमीशन मिलता है, जबकि गोदाम से दुकान तक लाने और उसे बांटने में कई गुना ज्यादा खर्चा हो जाता है, ऐसे में मजबूरी में कोटेदारों को फर्जीवाड़ा करना पड़ता है।”

अपनी बात को साफ करते हुए वो बताते हैं, “एक कोटेदार को हर महीने औसतन 80 से 90 क्विंटल गेहूं, 50 क्विंटल चावल और 1000 लीटर मिट्टी का तेल बांटने के लिए तीन से चार बार दिया जाता है। सरकारी गोदाम से माल उठाने से पहले ही 40 ररुपए क्विंटल गोदाम इंचार्ज को सुविधा शुल्क देना पड़ जाता है। फिर धर्मकांटे पर वजन कराने और गोदाम से दुकान तक लाने का भाड़ा, मज़दूरी भी चुकानी पड़ जाती है। यही नहीं प्रति एजेंसी 4000 रुपए के हिसाब से विभाग में भी लिए जाते हैं। बिजली खर्च, दुकान किराया, कर्मचारी अलग से होता है। इसलिए नुकसान की भरपाई के लिए कई कोटेदार राशन बेच देते हैं।”

सरकारी बोरियों से चोरी होता है राशन

गाँव कनेक्शन की पड़ताल में पता चला कि डिपो से अनाज उठाए जाने के बाद खदान माफिया उसे अपने गोदामों पर पहुंचाते हैं और वहां उनकी सील खोलकर अनाज दूसरी बोरियों में भरा जाता है, क्योंकि सरकारी बोरियों की आसानी से पहचान हो जाती है। इस गेहूं या चावल को आटा मिलों या फिर दूसरी बड़ी दुकानों पर बेच दिया जाता है।

एक और कोटेदार ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “इतना सब खर्च कर अगर राशन का वितरण ईमानदारी से करेंगे तो उन्हें हजारों रुपये का नुकसान उठाना पड़ जाएगा। ऐसे में

नुकसान की भरपाई के लिए फर्जी राशनकार्ड बनवाना मजबूरी बन जाता है। वहीं पचास प्रतिशत से अधिक राशन गोदामों पर ही मौजूद राशन माफियाओं को बेचना पड़ता है।”

पिछले दिनों दर्जनों लोगों के साथ प्रदर्शन कर डीएम को ज्ञापन सौंपने वाले आम आदमी पार्टी के नेता नीरज कुमार बताते हैं, “लिस्ट में काफी गड़बड़ी है, रोजाना हमारे यहां सैकड़ों लोग आते हैं राशन न मिलने की शिकायत करते हैं और हमसे सहायता मांगते हैं। गोविंदपुरी में एक दुकान में खुद राशन लेने गया था लेकिन हमें नहीं मिला। हम लोगों ने डीएम से शिकायत की तो कई कोटेदारों ने महिलाओं को गालियां और धमकी भी दी।”

मेरठ जि़ले के एआरओ मनोज जायसवाल ने बताया, “मेरठ जि़ले में 953 सरकारी राशन के कोटेदार हैं जिनके माध्यम से हर महीने 7 लाख 33 हज़ार 121 क्विंटल गेहूं, 31 हज़ार 419 क्विंटल चावल, 7 हज़ार 700 क्विंटल चीनी और 2 लाख 48 हज़ार 300 लीटर मिट्टी का तेल बांटने के लिए दिया जाता है। नई लिस्ट पर काम जारी है।”

कालाबाजारी की बात पर सफाई देते हुए वो कहते हैं, “इसे रोकने की जिम्मेदारी क्षेत्रीय वितरण अधिकारी की होती है। कहीं कोई पैसा लिया जाता है, तो मुझे इसकी जानकारी नहीं है। अगर कोई शिकायत करेगा तो कार्रवाई की जाएगी।” हालांकि इस बारे में बात करने पर क्षेत्रीय वितरण अधिकारी राहुल गौड़ ने बताया, ‘’हमारा काम गोदामों से सभी कोटेदारों का कोटा समयानुसार देना है, बाहर वो क्या करते हैं, इसकी जिम्मेदारी डीएसओ और एआरओ की है। वो जाँच करें की उनके गोदाम से माल निकलने के बाद कोटेदार की दूकान पर पुरा पहुंचा है या नहीं।

कभी-कभी ही खुलती है दुकान 

जवाहरपुरी, न्यू गोविंदपुरी और कंकरखेड़ा समेत कई इलाकों में जब राशनकार्ड धारकों से बात की गई तो उन्होंने बताया कि कोटेदार कभी-कभी ही दुकान खोलता है। बोर्ड पर तारीख़ तो लिख दी जाती है पर वितरण नहीं होता। शिकायत की भी जाती है तो सुनवाई नहीं होती। लिसाड़ी गेट क्षेत्र की फ़िरदौस (55 वर्ष) बताती हैं, "कोटेदार हमेशा बहाना बना देता है, कभी कहता है राशन आया नहीं कभी बोलता है, अगली तारीख को मिलेगा, पार्षद से भी शिकायत की लेकिन कुछ हुआ नहीं।"

ऐसे होती है राशन की कालाबाजारी

गोदामों से माल उठाकर बड़े मिल या दूसरी दुकानों पर माल पहुंचाने वाले एजेंट से जब गांव कनेक्शन ने बिना पहचान बताए बात कि तो उसने बताया, “हमारा काम गोदाम से माल उठाकर भाई जी (मालिक) के गोदाम तक ले जाना होता है, इस काम में परिचित ड्राइवर लगे होते हैं। हमारे पास हरियाणा में नीलाम हुए अनाज की पर्ची, टैक्स के पेपर और दूसरे सभी कागजात होते हैं। गोदाम पर माल ले जाकर सरकारी बोरियों से माल दूसरी बोरियों में भरते हैं, फिर मंडी समिति से प्रति बोरी 20 रुपए देकर नई पर्ची बनवाते हैं और उन्हें सीधे गाजियाबाद या दिल्ली की मंडी में पहुंचा देते हैं। इस काम में हर स्तर पर पैसा देते हैं। (इस बातचीत की रिकॉर्डिंग गाँव कनेक्शन के पास है।)

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