सरकारी स्कूलों में बगैर किताबों के पढ़ रहे बच्चे

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शाहजहांपुर। सरकारी स्कूलों, मदरसों में शैक्षिक सत्र की शुरुआत हुए तीन महीने से अधिक समय बीत चुका है लेकिन उन्हें अभी तक किताबें मुहैया नहीं कराई जा सकी हैं। ऐसे में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को अच्छे भविष्य देने का सरकार का वादा टूटता नजर आ रहा है।

यह इस सत्र का ही रोना नहीं है। हर साल सत्र शुरू होने के बाद प्रकाशकों के टेंडर पड़ते हैं फिर पुस्तकों के प्रकाशित और वितरण होते-होते आधा सत्र बीत चुका होता है। इसका खामियाजा बच्चे भुगतते हैं, जो आधी-अधूरी फटी-फटाई पुरानी पुस्तकों से पढ़कर परीक्षा दे डालते हैं।

सरकारी स्कूलों में निर्धन नौनिहालों के पंजीकरण का मुख्य उद्देश्य शिक्षित कर स्वावलंबी बनाना है। स्कूल में दूध, फल बंटने की तो बातें रोजाना हो रही हैं लेकिन मूलभूत आवश्यकता पाठ्य-पुस्तकों के बंटने की अभी तक कोई चर्चा भी शुरू नहीं हुई है। ऐसे में परिषदीय स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था ही पटरी से उतरी चल रही है। 

राष्ट्रीय बालचर्या की रूपरेखा 2005 और इच्छा अधिनियम 2009 के जनपद के मास्टर ट्रेनर रामसेवक शर्मा का कहना है, “परिषदीय विद्यालयों में पुरानी किताबों से काम चलाया जा रहा है। इस सत्र में अधिक बच्चों का नामांकन हुआ है। इससे इस सत्र किताबें कम पड़ गई हैं। जो किताबें हैं भी तो वह फटी हुई हैं। इससे किताबों के बिना अध्यापन में अत्यंत असुविधा महसूस हो रही है।”

एमडीएम, दूध-फल वितरण पर अधिक जोर दिया जा रहा है। जबकि शासन-प्रशासन शैक्षिक गुणवत्ता की बात करता है। प्राथमिकता पुस्तक, शैक्षिक गुणवत्ता के बजाय अन्य बातों पर दिया जाना बेसिक शिक्षा की त्रासदी है। अरबिया टीचर्स एसोसिएशन के प्रांतीय सचिव अशफाक हुसैन ने बताया, “जिले में संचालित अशासकीय सहायता प्राप्त पांच मदरसों में किताबें मुहैय्या नहीं कराई गई हैं। इससे मदरसा में पठन-पाठन में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। वहीं उर्दू की पाठ्य पुस्तकें गत सत्र में भी नहीं मिली थी। लेकिन इस सत्र में भी कोई भी पुस्तक का मदरसों को उपलब्ध न होना बेहद अफसोस की बात है।”

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