कानपुर की जनता को रास आ रहा स्वच्छता का ऐप

कानपुर की जनता को रास आ रहा स्वच्छता का ऐपगन्दगी की समस्या की फोटो भेज देने मात्र से कुछ ही घंटों के अंदर समस्या का निस्तारण शुरू हो जाता है।

राजीव शुक्ला ,स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

कानपुर। कानपुर के निवासियों में शहरी विकास मंत्रालय की एक ऐप्लीकेशन का प्रचलन तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि इस ऐप्लीकेशन में शहर में फैली कहीं की भी गन्दगी की समस्या की फोटो भेज देने मात्र से कुछ ही घंटों के अंदर समस्या का निस्तारण शुरू हो जाता है।

मोबाइल ऐप्लीकेशन से सफाई का यह तरीका कानपुर की जनता को बहुत पसन्द आ रहा है। देशभर में चल रहे स्वच्छता सर्वेक्षण में स्वच्छ भारत मिशन के तहत सफाई व्यवस्था की जानकारी और इसमें सुधार के लिए ‘स्वच्छता एमओयूडी’ मोबाइल ऐप्लीकेशन बनाई गई है। इस मोबाइल एेप को डाउनलोड करने और इसमें गंदगी की फोटो भेजने पर सफाई होने के साथ ही शहर को भी नंबर मिलते हैं, जिससे पूरे देशभर में चल रहे स्वच्छता सर्वेक्षण में शहर की रैंकिंग भी सुधरती है।

इस मोबाइल ऐप्लीकेशन के माध्यम से आने वाली सभी शिकायतों का प्राथमिकता के आधार पर निस्तारण किया जाता है। साथ ही हमारी कोशिश यह रहती है कि समस्या का निस्तारण उसी दिन कर दिया जाये, लेकिन यदि समस्या बड़ी होती है तो समस्या के आधार पर उसको एक से तीन दिन में दूर कर दिया जाता है।
डॉ. पंकज श्रीवास्तव, नगर स्वास्थ्य अधिकारी

यह मिलती हैं सुविधाएं

अपने मोबाइल में ऐप्लीकेशन को डाउनलोड कर इंस्टॉल करने के बाद ऐप्लीकेशन को खोलते ही पोस्ट योर फर्स्ट कंपलेन, प्रोफाइल आदि लिखकर आता है। जिसमें पोस्ट योर फर्स्ट कंपलेंन में क्लिक करते ही शहर में किसी भी स्थान में मृत जानवर के शव का पड़ा होना, कचरे के डिब्बे का खाली न होने, कचरे का ढेर लगार, कचरे की गाड़ी वहां न आना, झाड़ू न लगना, सार्वजनिक शौचालय में बिजली का न होना, सार्वजनिक शौचालय में पानी की आपूर्ति न होना, सीवर लाइन में अवरोध और शौचालय में सफाई न होने के कॉलम आते हैं। किसी भी एक कॉलम में क्लिक करके सेंड करने से ही उक्त समस्या की फोटो शहरी विकास मंत्रालय और नगर निगम में नगर स्वास्थ्य अधिकारी के पास पहुंच जाती है। इसमें आपके द्वारा जिस स्थान की फोटो भेजी जाती है, उस स्थान की जानकारी जीपीएस के माध्यम से स्वत: ही हो जाती है। उसके बाद समस्या का हल नगर निगम के द्वारा कुछ घंटों या दिनों में कर दिया जाता है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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