गाँव के गीतों को खोज रही एक गायिका 

गाँव के गीतों को खोज रही एक गायिका चंदन तिवारी, लोकगीत गायिका।

बसंत कुमार

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

बिहार के भोजपुर जिला के बड़कागाँव में जन्मी और बोकारो में पली-बढ़ी चंदन तिवारी आज बिहार में लोक गायकी में मज़बूत पहचान बना चुकी हैं। 25 वर्षीय चन्दन गाँव की गलियों से गाने ढूंढ़ती हैं और उसे अपनी आवाज़ में पिरोती हैं।

चंदन का कहना है कि लोक से गीत लेकर लोक को लौटा रही हूं। शारदा सिन्हा और भरत शर्मा की परंपरा को अगर बढ़ाने वाली चंदन तिवारी की गाँव कनेक्शन से बातचीत......

आज जहां भोजपुरी के ज्यादातर गायक अश्लील गाने गाकर सफलता हासिल कर रहे हैं, वहीं आपने लोकगायन को चुना?

अश्लील गाने हमेशा से गाए जाते रहे हैं। इधर जब से वन नाइट स्टारडम का नया चलन बढ़ा है, उसका असर भोजपुरी संगीत पर भी बढ़ा है तो फूहड़ता की मात्रा बढ़ गई है। लेकिन आप देखिए कि जो भी इस तरह के गीत गानेवाले कलाकार रहे थे वे आज कहां हैं? फुहड़ गीत गाकर आप अपने समय में, कुछ देर के लिए, कुछ दिन के लिए चर्चा में तो रह सकते हैं, लेकिन कुछ समय बाद कोई नामलेवा नहीं रहता है।

आप अपने सफर के बारे में बताइए?

मैं मूल रूप से भोजपुर जिले के एक गाँव बड़कागाँव की हूं, लेकिन मैं पढ़ी—बढ़ी बोकारो में। बोकारो से ही मनोविज्ञान में स्नातक किया फिर प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद से संगीत में स्नातक। मां लोकगीत गाती रही हैं तो बचपन से उन्हें ही देखकर गाने का चस्का लगा। स्कूल में भी गई तो मास्टर साहब लोग जानते थे कि मेरा पढ़ने में मन नहीं लगता इसलिए वे आयोजन में गीत गवाने में ही ज्यादा ध्यान देते थे या कि होमवर्क कर के नहीं ले जाती थी तो सजा के तौर पर गीत सुनाने को ही कहा जाता था।

इस तरह बचपन से गीतों से जुड़ाव रहा। महुआ टीवी चैनल के दो शो सुर संग्राम और जिला टॉप में मैंने हिस्सा लिया। उसके बाद ही करियर बढ़ा।

गायक और गीतकार अक्सर सुनने वालों पर आरोप लगाते हैं कि लोग जैसा सुनना चाहते हैं, वहीं हम सुना रहे है? आपका क्या कहना हैं?

यह बड़ी अजीब सी बात होती है। गीतकार, गायक, कंपनियां और श्रोता, यही चार वर्ग होते हैं एक गीत के निर्माण से लेकर उसके श्रवण तक के बीच में और ये चारों एक दूसरे पर दोष देते हैं। कहा जाता है कि गीतकार वैसे ही लिख रहे हैं तो हम क्या गाएं।

कंपनियां कहती हैं कि गीतकार लिख रहे हैं, गायक गा रहे हैं, मार्केट में डिमांड हैं तो हम क्या करें और श्रोता कहते हैं कि गाने ऐसे ही आ रहे हैं तो हम क्या सुने। हमें लगता है कि किसी एक को दोषी कह भी नहीं सकते है। गायकों या गीतकारों के सामने तो सीधा यह सवाल होना चाहिए कि क्या आप अपने घर में, अपनी बहन या बेटी के सामने अपने ही गीत सुनाएंगे, जिसमें एक लड़की के अंग-अंग का वर्णन सिर्फ सेक्सुअल कुंठा को शांत करने के लिए कर रहे हैं।

एक से एक गीत हैं। गाँव के गलियों में बिखरे हुए या कि गुम हुए। मैं कोशिश कर रही हूं कि सबसे पहले तो जो कुछ ऐसे गीत हैं, जिनके गानेवाले कम बचे हैं या कि आखिरी पीढ़ी चल रही है, उनके धुन अपने पास रिकार्ड करके रख लूं।
चंदन तिवारी, गायिका

गाँवों में अलिखित गानों का भंडार हैं, जो नई पीढ़ी में ट्रांसफर नहीं हो रहा है। उन गानों को संग्रह करने का कोई विचार है?

मैं सबसे ज्यादा उसी पर फोकस हूं। एक से एक गीत हैं। गाँव के गलियों में बिखरे हुए या गुम हुए।मैं कोशिश कर रही हूं कि सबसे पहले तो जो कुछ ऐसे गीत हैं, जिनके गानेवाले कम बचे हैं या कि आखिरी पीढ़ी चल रही है, उनके धुन अपने पास रिकार्ड करके रख लूं। फिर जब समय मिले उसे तैयार करूं। मेरे अधिकतर गीत गाँव की गलियों से लिए हुए हैं।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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