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बच्चों में पढ़ने की ललक लेकिन माता पिता ही हैं उनकी अशिक्षा के ज़िम्मेदार

गाँव कनेक्शनगाँव कनेक्शन   28 March 2017 11:39 AM GMT

बच्चों में पढ़ने की ललक लेकिन माता पिता ही हैं उनकी अशिक्षा के ज़िम्मेदारपढ़ने की इच्छा तो बहुत है लेकिन घरवाले पढाना नहीं चाहते।

अश्वनी द्विवेदी, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। “हम भी कुछ करना चाहते हैं, हमारा भी मन है कि बंदिशों से बाहर आकर पढ़ें और अपने परिवार की मदद करें। हम भी कम्प्यूटर सीखना चाहते हैं, लेकिन क्या करें हमारे घर वाले ऐसा कभी नहीं करने देंगे और ये अरमान मन में ही रह जाएंगे।” ये बातें स्वयं प्रोजेक्ट के कार्यक्रम के दौरान उजमा (13 वर्ष) ने बहुत ही संकोच के साथ कह तो दिया पर उसे यह भी डर है कि इसके लिए उसे घर पर कहीं डांट न खानी पड़े।

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लखनऊ जनपद मुख्यालय से 45 किमी की दूर लखनऊ-बाराबंकी बार्डर के पास ग्राम सरावां में स्थित जामिया तैयब्बा लील बनाद मदरसे के एक अलग भवन में लड़कियों का स्कूल बनाया गया है। जहां पर मजहबी तालीम के साथ अन्य विषयों को भी नियमित रूप से पढ़ाया जाता है। हालांकि अभी यहां पर हाईस्कूल तक की तालीम ही दी जाती है।

मदरसे में गाँव कनेक्शन के महिला स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रम के दौरान छात्राओं से बात करने पर सरावां गाँव की निवासी कक्षा आठ की उजमा (13 वर्ष) ने बताया, “हमारे यहां ज्यादातर लड़कियां सिर्फ कक्षा आठ तक ही पढ़ी हैं। हमारे यहां घर वाले सयानी लड़कियों को पढ़ने के लिए नहीं भेजते। कक्षा आठ तक पढ़ लिया समझो पढ़ाई पूरी हो गयी।”

सयानी लड़कियों को पढ़ने ज्यादा दूर नहीं भेजा जाता। गाँव में ही एक मास्टर को बुला लिया जाता है जो लड़कियों को उर्दू और अरबी सीखा देता है।
निशा, कक्षा आठ की छात्रा ,निवासी ,मुसपीपरी

कक्षा छह में पढ़ने वाली सादिया (11 वर्ष) ने बताया, “हमारे यहां घर में दूध का करोबार होता है। मेरी बहनों को चारा, पानी और खेतीबाड़ी के भी काम करने होते हैं और फिर हम लोगों के यहां वैसे भी लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने का रीवाज नहीं है। हमारे गाँव की कोई भी लड़की ज्यादा नहीं पढ़ी है।”

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