पुरुष नसबंदी कराना आशा बहुओं के लिए चुनौती

पुरुष नसबंदी कराना आशा बहुओं के लिए चुनौतीपुरुषों के सामने बात करने से भी हिचकिचाती हैं आशा बहुएं  

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। गाँवों के लोगों तक परिवार नियोजन जैसे सामाजिक विषयों को ले जाने वाली आशा बहुओं के सामने मुश्किलें कम नहीं हैं। गाँव की आशा बहूएं महिलाओं के बीच अपनी छवि बनाए हुए हैं, लेकिन पुरुष अभी भी आशा बहुओं की बातों पर ध्यान नहीं देते हैं।

“हम घर-घर जाकर नसबंदी के बारे में पूरी जानकारी देते हैं। महिलाएं तो मान जाती हैं, लेकिन पुरुषों को समझाना बहुत मुश्किल होता है। पुरुष राजी ही नहीं होते हैं। घर के बड़े-बुजुर्ग भी नसबंदी के लिए महिलाओं को आगे कर देते हैं।” यह कहना है, रेखा यादव (31 वर्ष)। रेखा शाहजहांपुर जिले से पूर्व दिशा में लगभग 30 किलोमीटर दूर ददरौल ब्लॉक में पिछले पांच सालों से आशा बहू है। रेखा बताती हैं, “महिलाएं खुद पतियों को मना कर देती हैं तो जब भी घर जाते हैं तो पुरुष सामने ही नहीं आते हैं।”

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और सिफ्सा से जारी आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में 20.7 प्रतिशत दंपति गर्भधारण करना चाहते हैं, लेकिन गर्भ निरोधक साधन का प्रयोग नहीं कर रहे हैं। ऐसे दंपतियों की संख्या हमारे यहां अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक है।

नसंबदी को लेकर आने वाली समस्याओं के बारे में बरेली जिले के शेरगढ़ ब्लॉक के चटिया गाँव आशा बहू यशोदा देवी (28 वर्ष) बताती हैं, “गाँव में पुरुषों के सामने बात करने में हिचक होती है। महिलाओं को तो आसानी से समझा देते हैं, लेकिन अपने से बड़े पुरुषों जिनसे पर्दा करते हैं, दिक्क्त होती है।”

स्टेट आशा कोओर्डिनेटर बलराम तिवारी बताते हैं, “पुरुषों की नसबंदी सरल और आसान है, बावजूद इसके पुरुष आगे नहीं आते हैं। इसका कारण गाँवों में रुढ़िवादिता सोच भी है। आशा बहू गाँव में जाती तो हैं, लेकिन महिलाओं को ही इसके लिए प्रोत्साहित कर पाती हैं। आशा बहुओं को नसबंदी कराने के लिए अच्छी प्रोत्साहन राशि भी मिलती है, लेकिन वो पुरुषों के सामने बाते करने में हिचकिचाती हैं।”

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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