नोटबंदी से किसानों का शोषण, 700-800 रुपये कुंटल में बेचना पड़ रहा है धान, साहूकारों से ले रहे उधार

नोटबंदी से किसानों का शोषण, 700-800 रुपये कुंटल में बेचना पड़ रहा है धान, साहूकारों से ले रहे उधारयूपी में लखनऊ के पास एक खेत में धान तैयार करता किसान।

अरुण मिश्रा, कम्यूनिटी जर्नलिस्ट

विशुनपुर (बाराबंकी) । नोटबंदी का असर किसानों पर सीधा पड़ रहा है। किसान अपनी उपज का उचित मूल्य पाने के लिए दर दर भटक रहे हैं। उनके घरों में कामकाज ठप हो गया है। खेतों की बुआई नहीं हो पा रही है।

नोटबंदी के चलते कुछ व्यापारी किसानों की मज़बूरी का फायदा उठाकर औने पौने दामों में धान खरीद रहे हैं। किसानों को कम दाम पर धान बेचना मजबूरी है क्योंकि उनके पास खाद बीज खरीदने के लिए पैसा नही हैं। उत्तर प्रदेश समेत देश के कई इलाकों में नवंबर महीने में रबी की फसल की बुआई हो रही है। इस दौरान ज्यादातर किसान खरीफ की धान-उड़द और मक्का (उपज) आदि बेचकर ऩई फसल का इंतजाम करते हैं, जिसमें धान मुख्य फसल है। लेकिन किसानों को धान का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। वैसे तो सरकार ने 1500 रुपये प्रति कुंटल तक का धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया है लेकिन नोटबंदी के चलते ये किसान अपना यही धान 700-800 प्रति कुंटल में बेचने को मजबूर है।

गेहूं बोने के लिए धान बेचने गया था तो व्यापारी ने कहा नए नोट लोगो तो रेट 750 रुपये दूंगा पुराने नोट लो तो 1200 में ले सकता हूं। मेरी मजबूरी थी तो मैने बेच दिया।
शिवकुमार यादव, किसान बसारा गांव, बाराबंकी

बाराबंकी में देवां ब्लॉक में बसारा गांव शिवकुमार यादव मायूसी के साथ बताते हैं, “हमें खाद खरीदने के लिए पैसे की जरूरत थी, धान व्यापारी के पास ले गए लेकिन व्यापारी पैसा न होने का हवाला देकर धान खरीदने से इंकार कर दिया जब हमने बहुत खुशामद की तो व्यापारी धान लेने को तैयार हुआ लेकिन व्यापारी ने शर्त रखी कि नई नोटों से 750 में व पुरानी नोटों से 1200 में धान खरीदेगे।हमे पैसो की जरूरत थी इसलिए हमें बेचना पड़ा।”

बसारा के शिवकुमार की तरह प्रदेश के हजारों किसान इनदिनों अपने ही अनाज की बिक्री के भटक रहे हैं। खाद और डीजल का इंतजाम करने के लिए वो दिन-दिन भर बैंक की लाइन में लगते हैं वहां भी इतने कम पैसे निकल रहे हैं कि खेती पिछड़ रहा है। पैसों की जरुरत पूरी करने के लिए कई किसान साहूकारों से ब्याज पर पैसे ले रहे हैं।

समस्या सिर्फ फसल बेचने की नहीं है। किसान अगर कहीं से पैसे की व्यवस्था कर भी रहा है तो उर्वरक और बीज महंगे मिल रहे हैं। डीएपी का सरकारी रेट 1010 रुपये है लेकिन बिशुनपर और देवां समेत कई जगहों पर निजी दुकानदार 1040 से 1050 तक का रेट ले रहे हैं। सिसवारा गांव के किसान मिंटू मिश्रा ने बताया, “जब हम दुकान पर खाद लेने गए तो दुकानदार ने कहा कि नई करेंसी पर 1010 की खाद मिलेगी पुरानी करेंसी पर 1050 की मिलेगी हमारी जरूरत थी इसलिए 1050 रूपये देकर उर्वरक खरीदी। सहकारी समितियों पर धान खरीद शुरू न होने से भी किसानो की मुसीबतो को और बढ़ा दिया है। अधिकतर किसान नोट बन्दी से सहमत है लेकिन सबकी जुबां पर एक ही बात है कि यदि नोट बंदी एक महीने बाद होती तो किसानों का सारा काम हो जाता, जिससे किसानों को इतनी दिक्कतों का सामना न करना पड़ता।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).


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