दिव्यांग छात्र-छात्राओं को नई सरकार से कई उम्मीदें 

दिव्यांग छात्र-छात्राओं को नई सरकार से कई उम्मीदें दिव्यांग छात्र-छात्राओं को भी नई सरकार से कई अपेक्षाएं हैं।

मीनल टिंगल, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। दिव्यांग छात्र-छात्राओं को भी नई सरकार से कई अपेक्षाएं हैं। छात्रों के साथ उनके शिक्षकों और अभिभावकों ने भी नई सरकार से कई उम्मीदें लगा रखी हैं।

प्राथमिक विद्यालय बरखपुर, रायबरेली में कक्षा चार में पढ़ने वाले दिव्यांग जितेन्द्र के पिता उदयराज मजदूरी करते हैं। उदयराज कहते हैं, “स्कूल में सप्ताह में कुल दो दिन बच्चे को पढ़ाया जाता है। जब इन बच्चों को पढ़ाने के लिए खास वाले शिक्षक आते हैं तब। बाकी दिन स्कूल में बच्चा बस बैठा रहता है। सप्ताह में दो दिन की पढ़ाई से क्या सीख लेगा इसलिए स्कूल भी कम भी भेजते हैं। इन बच्चों की पढ़ाई भी रोज होनी चाहिये।”

आरटीआई से प्राप्त जानकारी के तहत वर्ष 2001 के अनुसार प्रदेश में लगभग 10 लाख 36 हजार दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने के लिए मात्र दो हजार शिक्षक ही नियुक्त किए गये हैं वह भी संविदा पर। जबकि नियम के आधार पर प्राथमिक विद्यालय के लिए दो दिव्यांग बच्चों पर एक शिक्षक और पूर्व माध्यमिक विद्यालय के लिए पांच बच्चों पर एक शिक्षक की जरूरत होती है। आरटीई यानी शिक्षा का अधिकार लागू है, ज़ीरो रिजेक्शन पालिसी लागू है, जिसके तहत हर तरह के बच्चे की शिक्षा की नि:शुल्क व अनिवार्य व्यवस्था होनी चाहिए, लेकिन कुल आबादी का तीन फीसदी विकलांग व 10 से 15 फीसदी अक्षम बच्चे आज भी विशेष शिक्षकों के अभाव में शिक्षा से वंचित हैं।

सरकार को मेरे और मेरे जैसे लोगों को रोजगार दिलवाने के बारे में सोचना चाहिए। इससे हम लोगों को किसी पर आश्रित रहे बिना स्वाभिमान के साथ जिंदगी जीने में आसानी होगी।
शिल्पी गुप्ता, छात्रा

रायबरेली के नगर क्षेत्र व अमावा ब्लॉक में दिव्यांग बच्चों को शिक्षित कर रहे शिक्षक अभय प्रकाश सिंह कहते हैं, “हम शिक्षकों की यह चाह है कि ज्यादा से ज्यादा स्कूलों में दिव्यांग बच्चों को शिक्षित कर सकें। इसके लिए जरूरी है कि शिक्षकों की संख्या बढ़ाई जाए। हमारी मजबूरी है कि चाहकर भी हम बच्चों को उस तरह शिक्षित नहीं कर सकते, जिस तरह से करना चाहिये क्योंकि दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक ही नहीं हैं। इसके साथ ही दिव्यांग बच्चों को स्कूल तक लाने और ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था भी की जानी चाहिए। इसके अभाव में बच्चे स्कूल नहीं आ पाते और एमडीएम से भी वंचित रह जाते हैं, जिसके चलते उनके स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है।

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