गाँव का नाम रोशन करना चाहती हैं दिव्यांग बहनें, एक बहन को गीत लिखने का तो दूसरी बहन को है गायन का शौक

गाँव का नाम रोशन करना चाहती हैं दिव्यांग बहनें, एक बहन को गीत लिखने का तो दूसरी बहन को है गायन का शौकबाराबंकी के महोलिया गाँव की ये बहनें बच्चों को भी सिखाती हैं।

दीपांशु मिश्रा, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

बाराबंकी। शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद गाँव की दो बहनें अपने हुनर से अपने कॉलेज का नाम रोशन कर रही हैं, लेकिन सीमित संसाधनों के कारण आगे नहीं बढ़ पा रही हैं।

बाराबंकी जिला मुख्यालय से लगभग 45 किलोमीटर दूर निन्दूरा ब्लॉक के महोलिया गाँव में रहने वाली रेखा शर्मा (19 वर्ष) और रानी पाण्डेय शारीरिक रूप से अक्षम हैं, लेकिन दोनों में हुनर की कमी नहीं है। रेखा गीत, कहानियां और कविताएं लिखती हैं और लिखने के साथ ही गाती भी हैं। वहीं रानी रेखा के लिखे गीतों को गाती हैं। ये दोनों बहनें दिव्यांग हैं, फिर भी कभी आज तक दोनों ही बहनों ने अपनी दिव्यांगता को सफलता के मार्ग का रोड़ा बनने नहीं दिया।

मेरे पिताजी इस दुनिया में नहीं है। मैं अभी बारहवीं में पढ़ती हूं। मुझे गीत गाना और बनाना बहुत अच्छा लगता है। मैं कहानियां लिखती हूं, जिससे समाज पर मेरी कहानियों का फर्क पड़े और वो उन कहनियों से कुछ सीख ले सकें। मैं अपनी खुद तो लिखती ही हूं साथ में अपने साथियों को लिखना और गाना सिखाती हूं।
रेखा शर्मा

शारीरिक रुप से अक्षम होने के बावजूद दोनों लड़कियां संगीत प्रतियोगिता में भाग लेकर अपने गाँव का नाम करना चाहती हैं। रेखा आगे बताती हैं, ''मेरे विद्यालय के अध्यापक केवल पढ़ाते ही नहीं हैं, बल्कि हमारी हर जगह सहायता भी करते हैं। सब चाहते हैं मैं आगे जाऊं, जिससे मैं अपने विद्यालय के साथ-साथ गाँव का भी नाम रोशन कर सकूं।''

मै भी इसी विद्यालय में पढ़ती हूं। मुझे लिखना तो नहीं आता है, लेकिन मैं अपनी दीदी के लिखे गीतों को गाती हूं। मैं आगे बढ़ना चाहती हूं, लेकिन कोई भी आगे बढ़ने का साधन नहीं है।
रानी पाण्डेय

एसकेएम विद्यालय के प्रबंधक राजेश बंसल (40 वर्ष) बताते हैं, ''दोनों लड़कियों के अन्दर बहुत अच्छे हुनर हैं। ये दोनों खुद तो गाती हैं, साथ में बच्चों को भी लिखना और गाना सिखाती हैं। मैं खुद भी चाहता हूं कि ये दोनों लड़कियां आगे बढ़ जाये और अपने साथ-साथ विद्यालय का भी नाम रोशन कर सकें।''

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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