जानकारी न होने से पशुपालकों को नहीं मिलता योजनाओं का लाभ

Diti BajpaiDiti Bajpai   20 April 2017 12:45 PM GMT

जानकारी न होने से पशुपालकों को नहीं मिलता योजनाओं का लाभचारे की कमी को पूरा करने के लिए पशुपालन विभाग द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही है।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। गर्मियों में हरे चारे की कमी को पूरा करने के लिए पशुपालन विभाग द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही है, लेकिन किसी भी योजना के बारे में पशुपालकों को जानकारी ही नहीं है।

विनोद सिंह (55 वर्ष) बताते हैं, “हम तो वर्षों से अपने पशुओं को हरा चारा खिला रहे हैं, पर योजना के बारे में हमें कोई भी जानकारी नहीं है। पशुओं के लिए हम खुद उन्नत किस्म के बीज लाकर बो देते हैं।” विनोद लखनऊ जिला मुख्यालय से 30 किमी दूर सरोजनी नगर ब्लॉक के हिंदूखेड़ा गाँव में पिछले पांच वर्षों से डेयरी चला रहे हैं।

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प्रदेश में हरे चारे की कमी को पूरा करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा अतिरिक्त हरा चारा उत्पादन योजना चलाई जा रही है। इस योजना के तहत हर न्याय पंचायत में मिनी किट पशुपालकों को दी जाती है, जिसमें उन्नत किस्म के बीज पशुपालकों को दिए जाते हैं। इसका चयन ग्राम प्रधान और मुख्य पशुचिकित्साधिकारी करते हैं। इसके अलावा राज्य सरकार द्वारा हरा चारा उत्पादन योजना भी चल रही है, जिसके बारे में पशुपालकों को कोई भी जानकारी नहीं है। हिंदूखेड़ा गाँव के निरंकार सिंह (47 वर्ष) के पास पांच भैंसे हैं।

इस योजना की जानकारी ग्राम प्रधानों और मुख्य पशु चिकित्साधिकारी को दी जाती है।
डॉ. वीके सिंह, उपनिदेशक, पशुपालन विभाग

निरंकार बताते हैं, “700 रुपए प्रति कुंतल भूसा मिल रहा है। इसके अलावा चूनी और चोकर के रेट भी बढ़ रहे हैं। ऐसे में पशुओं का पेट भरना मुश्किल होता है। अगर सरकार द्वारा ऐसी कोई योजना चल रही है तो सरकार को इसका प्रचार-प्रसार करना चाहिए जो कभी हुआ नहीं है।”

इंडिया स्पेंड के आंकड़ों के अनुसार, भारत में दूध और दूध से बने उत्पाद की मांग तेजी से बढ़ रही है। दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए भारत को साल 2020 तक 1764 टन अतिरिक्त पशु चारे की जरूरत होगी, लेकिन मौजूदा संसाधनों के आधार पर केवल 900 टन पशु चारा ही उपलब्ध हो सकेगा। यानी जरूरत का केवल 49 फीसदी पशु चारा ही भारत के पास उपलब्ध होगा।

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