शर्मनाक! औरतों पर हाथ उठाने वाले प्रदेशों में हम आगे

शर्मनाक! औरतों पर हाथ उठाने वाले प्रदेशों  में हम आगेघरेलू हिंसा। प्रतीकात्मक फोटो: साभार इंटरनेट

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने का कानून वजूद में है, लेकिन यह उन पर उठने वाले पुरुषों के हाथ को नहीं रोक पा रहा है। घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की सिसकियां यूं तो पूरे देश में सुनी और महसूस की जा सकती हैं, पर अपना प्रदेश (उत्तर प्रदेश) इसमें सबसे आगे है।

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इसकी बानगी इसी से समझा जा सकता है कि बनारस रेलवे स्टेशन के प्लेटफोर्म नम्बर 9 पर रात 11 बजे एक पुरुष अपनी पत्नी को मार रहा था। प्लेटफार्म पर बहुत कम लोग मौजूद थे, लेकिन कोई भी उसे रोकने का साहस नहीं कर सका। ऐसे ही रोजाना घरों में व घर के बाहर भी महिलाओं को घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ता है। ऐसी ही एक घटना के बाबत लखनऊ एसएसपी कार्यालय पहुंची रोजी (बदला नाम) बताती हैं, ‘‘मेरे पति किसी और महिला से शादी करना चाहते हैं। शादी के दो साल बाद से वो मुझसे ठीक से बातचीत नहीं करते हैं। मैं कहती हूं कि मुझे तलाक़ दे दीजिए और शादी कीजिए तो मारते हैं। वो मुझे अपने घर में नहीं रहने देते और ना ही तलाक़ देते हैं। मैं पुलिस से मदद मांग-मांग कर थक गई हूं, पुलिस भी सुन नहीं रही है।"

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यह दर्द महज रोजी का ही नहीं है, बल्कि तमाम महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं। महिलाओं के प्रति अपराध की संख्या का आंकड़ा भी इसका गवाह है। भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध के सम्बन्ध में वर्ष 2015 में जो मामले दर्ज हुए हैं उनमें उत्तर प्रदेश का पहला स्थान है। उत्तर प्रदेश में 35527, महाराष्ट्र में 31126, पश्चिम बंगाल में 33218 मामले दर्ज हुए हैं।

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महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम वर्ष 2005 बना और 26 अक्टूबर 2016 से यह लागू भी है। लेकिन, महिलाओं के हालात में कोई खास तब्दीली नहीं नजर आ रही है। महिलाओं के हित के लिए काम करने वाली संस्था महिला समाख्या की जिला कार्यक्रम समन्वयक पंकज सिंह बताती हैं, ''इलाहाबाद के कई ब्लॉक में महिलाएं रोजाना घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। पति का पत्नियों को मारते पीटते हैं। महिलाएं आर्थिक रूप से कमजोर हैं और पुरुषों के बिना अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचती भी नहीं तो वो मार खाती हैं।’’

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महिलाओं को लेकर काम करने वाली संस्था ब्रेकथ्रू की स्टेट समन्वयक कृति प्रकाश का मानना है कि घरेलू हिंसा का किसी जाति या क्लास से कोई संबन्ध नहीं है। यह हर क्लास में मौजूद है। गाँव में लोग घर के बाहर भी लड़ते हैं, इसीलिए लोगों को जानकारी हो जाती है। लेकिन, शहरों में भी घरों के अंदर, वाशरूम में जो महिलाएं हिंसा की शिकार होती हैं, उसकी जानकारी बाहर कम ही आ पाती है।

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कृति प्रकाश बताती हैं, "महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम साल 2005 में बना था। कानून बहुत मजबूत है, लेकिन उसका पालन कितना हो रहा है। पुलिस को भी इस कानून की ठीक से जानकारी नहीं है। घरेलू हिंसा के मामले में डोमेस्टिक इंसिडेंट रिपोर्ट (डीआईआर) दर्ज कराया जाता है। इसके अंतर्गत तीन दिन में पीड़िता को न्याय दिलाना होता है। मगर, यहां तो कई बार डीआईआर कराने में ही महीनों लग जाते हैं।"

घरेलू हिंसा के कारण बढ़ती हैं आत्महत्या की घटनाएं

भारत में घरेलू हिंसा के कारण महिलाएं विरोध करने की जगह आत्महत्या का रास्ता अपना लेती हैं। वर्ष 2014 में, कम से कम 20,148 गृहिणियों ने आत्महत्या की है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार पिछले चार वर्षों से वर्ष 2015 तक महिलाओं के खिलाफ अपराध में 34 फीसदी की वृद्धि हुई है जिसमें पीड़ित महिलाओं द्वारा पति और रिश्तेदारों के खिलाफ सबसे अधिक मामले दर्ज हुए हैं।

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