सब्सिडी के बावजूद किसानों को क्यों नहीं मिल रहा ‘स्प्रिंकलर ड्रिप इरीगेशन योजना’ का लाभ?

Neetu SinghNeetu Singh   4 May 2017 2:40 PM GMT

सब्सिडी के बावजूद किसानों को क्यों नहीं मिल रहा ‘स्प्रिंकलर ड्रिप इरीगेशन योजना’ का लाभ?स्प्रिंकलर से सिंचाई।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। स्प्रिंकलर ड्रिप इरीगेशन योजना का विस्तार भले ही किया जाए पर ग्रामीण स्तर पर इस योजना की हकीकत ये है कि सालों से चल रही इस योजना में अच्छी सब्सिडी मिलने के बावजूद लाभ लेने वाले किसानों की संख्या बहुत कम है।

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“ये योजना तो बहुत अच्छी है लेकिन साधारण किसान अभी भी इस योजना का लाभ लेने में सक्षम नहीं है। किसान के पास ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगवाने के लिए इतना पैसा नहीं है जिससे वो इस योजना का लाभ ले सके।” ये कहना है सीतापुर जिले से 65 किलोमीटर दूर पाल्हापुर गाँव के किसान रूद्र बाल सिंह (63 वर्ष) का। वो आगे बताते हैं, “अगर प्रदेश सरकार इस योजना में कुछ संशोधन कर दें जिससे आम किसान इसे आसानी से लगवा सके।”

ऊर्जा मंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार एवं राष्ट्रीय सचिव श्रीकांत शर्मा ने ट्वीट करके कहा है, “बुन्देलखण्ड और गन्ना उत्पादन क्षेत्र में स्प्रिंकलर ड्रिप इरीगेशन सिस्टम का विस्तार किया जाएगा, जिससे किसानों की मुश्किलें आसान हो सकें।” प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत किसानों के लिए पानी की बचत और खेती की लागत कम करने के लिए पिछले कई वर्षों से बूंद-बूंद सिंचाई समेत दूसरे विधियों को प्रोत्साहित करने की कवायद चल रही है, उद्यान विभाग द्वारा इस योजना में अनुदान भी दिया जा रहा है।

गाँव कनेक्शन ने जब स्प्रिंकलर ड्रिप इरीगेशन सिस्टम योजना के बारे में सीतापुर, इलाहाबाद, चित्रकूट, जौनपुर, कानपुर देहात, ललितपुर सहित कई जिलों के किसानों से बात की तो किसानों ने एक ही जवाब दिया, “योजना अच्छी है पर पूरा पैसा पहले किसान को ही लगाना पड़ता है, बाद में सब्सिडी खाते में आती है, हमारे पास इतना पैसा नहीं है।”

डीबीटी के जरिए मिलती है सब्सिडी

इस योजना में भी डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) सिस्टम लागू है, जिसमें किसान को पहले अपने पास से लगाना है और बाद में अनुदान की धन राशि खाते में जाती है। योजना का विस्तार करने के साथ ही प्रदेश सरकार को इस पर भी विचार करना होगा कि क्या किसान इतने पैसे लगाने में सक्षम है भी या नहीं। बूंद-बूंद सिंचाई, टपक और फव्वारा के लिए सरकार फसल से लेकर बागवानी तक के लिए अऩुदान देती है। सब्जियों की खेती यानी शाकभाजी के लिए इसकी लागत एक लाख, केले के लिए 84400, पपीता के लिए 58400, अमरुद के लिए 33900 और आम के लिए 23500 प्रति हेक्टेयर निर्धारित है।

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