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जौनपुर गाँव की महिला किसान खेती में करती हैं मटका खाद का प्रयोग

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

जौनपुर। जिले की महिला किसान अब कीटनाशक खरीदने के लिए बाजार नहीं जाती हैं। ज्यादातर सब्जियों की खेती करने वाली ये महिलाएं अपने द्वारा बनाई गई मटका खाद का इस्तेमाल करती हैं।

जौनपुर जिला मुख्यालय से 68 किलोमीटर दूर मुगराबादशाहपुर के नरायनडी गाँव की महिलाएं घर पर ही मटका खाद बना लेती हैं। पैसा बचाने के साथ ही ये महिलाएं जैविक सब्जियां खाती और बेचती हैं।

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पतिया देवी इसी गाँव की रहने वाली एक बुजुर्ग महिला हैं। वो बताती है, “जब से मैं अपने खेत में ये दवा डालने लगी हूं, तबसे देखा-देखी गाँव की और महिलाएं भी ये खाद बनाने लगी हैं।”

पतिया देवी कहना है, “चार वर्षों से मटका खाद बना रहे हैं। सब्जी और फसल में कोई भी कीड़ा लग जाए तो हम इसी का छिड़काव कर देते हैं। हमारे पास ज्यादा खेती नहीं है। पहले कीड़े लगने पर बाजार से जो दवा खरीदते थे वो बहुत महंगी पड़ती थी।एक बीघा के लिए मटका खाद बनाने में सिर्फ 50 रुपए का खर्चा आता है, जबकि बाजार से यही कीटनाशक खरीदने पर 300-500 रुपए का खर्च आता है।”महिला समाख्या द्वारा महिलाओं को रोजगार देने के लिए चार वर्ष पहले इस तरह का प्रयास शुरू किया गया था।

गाँव में गरीबी बहुत है। पहले कीटनाशक खरीदने के लिए उधार पैसा मांगना पड़ता था। कई बार जब पैदावार अच्छी नहीं होती थी तो ये महिलाएं कर्जा भी नहीं दे पाती थीं।”
मंजू सरोज , क्लस्टर इंचार्ज , महिला समाख्या

वो आगे बताती हैं, “ये महिलाएं न सिर्फ मटका खाद बनाती हैं बल्कि गड्ढे वाली गोबर खाद का भी इस्तेमाल करती हैं, यहां की महिलाएं बाजार से खाद और कीटनाशक बहुत कम खरीदती हैं।” इसी गाँव की दौलती देवी (53 वर्ष) बताती हैं, “जबसे बाजार की दवा डालनी बन्द की है तबसे सब्जियों का स्वाद बहुत अच्छा हो गया है, घर में सब्जी बनाते हैं तो बाहर तक खुशबू आती है। अब बीमार भी कम पड़ते हैं।”

मटका खाद बनाने की विधि

मिट्टी के एक घड़े में पांच किलो देशी गाय का गोबर, पांच किलो गोमूत्र, 500 ग्राम नीम की पत्ती, एक किलो गुड़। एक घड़े में सबकुछ डालकर कपड़े से बांधकर 21 दिनों के लिए पेड़ की छांव में इसे रख देते हैं। 21 दिनों बाद इसे भुरभुरा कर देते हैं। एक बीघा में खाद का एक तिहाई गुना पानी मिलाते हैं। अगर एक किलो खाद है तो तीन लीटर पानी मिलाना होगा।

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