वोटों का खेल, नेताओं का जनता से हो रहा मेल 

वोटों का खेल, नेताओं का जनता से हो रहा मेल जो हमारे हाथ का बना हुआ जूता पहनना नहीं पसंद करते थे, वे आज हमारे कालिख लगे हाथों को मिलाने तक से ऐतराज नहीं कर रहे हैं।

रोहित श्रीवास्तव/नित्यम श्रीवास्तवस स्वयं कम्युनिटी जर्नलिस्ट

बहराइच। “जो हमारे हाथ का बना हुआ जूता पहनना नहीं पसंद करते थे, वे आज हमारे कालिख लगे हाथों को मिलाने तक से ऐतराज नहीं कर रहे हैं।” यह कहना है मोची का काम करने वाले पंकज कुमार का।

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इन दिनों काम न मिले तो भी कोई परेशानी नहीं, पास के नेता जी के यहां दो वक्त का खाना मिलना पक्का है।
अखबर अली, रिक्शा चालक

बहराइच में भी नेता घर-घर जाकर मतदाताओं से मिल रहे हैं और वोट देने के लिए अपील कर रहे हैं। स्थानीय लोग नेताओं के घर-घर आकर वोट मांगने पर कहते हैं कि ये लोग जीतने के पहले तक हमारे पास आ रहे हैं, जीतने के बाद हालचाल भी पूछने नहीं आयेंगे। प्रचार का तरीका भले ही बदल गया है।

हाईटेक प्रचार के संसाधन, सोशल मीडिया के जरिये चुनावी प्रचार-प्रसार हो रहा है, लेकिन इन सभी बड़े बदलावों के बीच अगर कोई चीज बिल्कुल पहले की तरह बची है तो वह नेताओं का चुनावों के समय जनता से मेल-मिलाप करना है। जनता इस बात से परिचित है कि नेता तब तक मिलने आयेंगे जब तक हार या जीत नहीं जाते हैं। जीतने-हारने के बाद उनका दर्शन मुमकिन कहां होता है। पान का दुकान चलाने वाले अन्ना कहते हैं, ‘‘जो कभी गाड़ी से नहीं उतरते थे वे आज मीठा पान खाने को आतुर हैं, आम दिनों में तो हम ही गाड़ी तक पान आदि पहुंचाया करते थे।”

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