प्रदेश में अश्वप्रजाति के पशुओं पर मंडरा रहा ग्लैण्डर्स बीमारी का खतरा

प्रदेश में अश्वप्रजाति के पशुओं पर मंडरा रहा ग्लैण्डर्स बीमारी का खतरालाइलाज है ग्लैण्डर्स बीमारी, ज्यादातर गधों में होती है यह बीमारी।

सुधा पाल, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। अश्वप्रजाति के पशुपालक पशुओं की सही देखभाल करके ही उन्हें बीमारी से बचा सकते हैं। इस समय प्रदेश के पशुओं पर ग्लैण्डर्स बीमारी का कहर तेजी से बढ़ रहा है जो कि एक जानलेवा बीमारी है और इसका कोई इलाज नहीं है।

हाल ही में यह संक्रामक बीमारी प्रदेश के कई जिलों के पशुओं में पाई गई। पशुओं के संपर्क में आने से पशुपालकों में भी यह बीमारी आसानी से हो सकती है। प्रदेश में अब तक 70 से ज्यादा पशुओं में यह बीमारी हो चुकी है जिससे उनकी मौत हो चुकी है।

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यह एक ऐसी बीमारी है जो कि बैक्टीरियल संक्रमण से फैलती है। इस बीमारी के लिए अभी तक किसी भी तरह का कोई इलाज नहीं खोजा गया है और न ही कोई टीका बना है। इसलिए पशुओं की देखभाल ही इससे बचने का एक मात्र तरीका है।
डॉ. वीके सिंह, उपनिदेशक, पशुपालन विभाग

पशु विभाग के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में कुल 2,51,118 अश्वप्रजाति के पशु मौजूद हैं। इन पशुओं में ग्लैण्डर्स बीमारी गधों में सबसे ज्यादा होती है। इसके अलावा घोड़ों और खच्चरों पर भी इसका प्रकोप पड़ सकता है। इस बीमारी में पशुओं के शरीर पर गांठें पड़ने लगती हैं और उन्हें सांस लेने में भी दिक्कत होने लगती है। बीमारी से ग्रस्त पशुओं को तेज बुखार हो सकता है। इसके साथ ही उनकी नाक से पानी आता है जो बाद में चाशनी की तरह गाढ़ा हो जाता है। बाद में यह पस बन जाता है जिसमें खून भी आ सकता है।

बीमारी के लक्षण मिलते ही पशुओं के रक्त को जांच के लिए भेजा जाता है। हरियाणा स्थित हिसार के राष्ट्रीय अश्वअनुसंधान संस्थान में पशुओं के रक्त के नमूने भेजे जाते हैं। वहां कॉम्प्लीमेंट फिक्सेशन जांच (सीएफटी) की जाती है और रिपोर्ट से ही बीमारी की पुष्टि होती है।
डॉ. वीके सिंह, उपनिदेशक, पशुपालन विभाग

लखीमपुर जिले से लगभग तीन किमी दूर मेवागंज ब्लॉक में लगभग 90 घोड़े हैं जिनका ज्यादातर पशुपालक बग्घी के लिए उपयोग करते हैं। ब्लॉक के गुल्जारनगर गाँव में बग्घी चालक हसरत अली (48 वर्ष) बताते हैं, “ हमारे पास तीन जानवर थे। 15 दिन पहले जांच की गई थी तो पता चला हमारी घोड़ी को ग्लैण्डर्स रोग हो गया है। उनके कहने पर उसका खाना पानी अलग किया है। उसे बाकी सब से अलग कमरे में बंद रखा।”

पशुपालक ने आगे बताया कि इस समय ब्लॉक में पशुओं की जांच चल रही है। अबतक गाँव में 25 घोड़ों की जांच की गई जिसमें से 2 घोड़ों में इस बीमारी के लक्षण देखे गए हैं। डॉक्टर बोल रहें हैं एक-दो दिन में घोड़ी को मारना है। इसके बदले हमें पैसा दिलवाया जाएगा।

डॉ. वीके सिंह का कहना है कि इसकी रोकथाम के लिए प्रदेश में सर्विलांस चलाया जा रहा है। इसके तहत यूपी के हर गाँव में जाकर पशुओं की जांच की जाएगी। इसके साथ ही पशुपालकों को इस बीमारी के प्रति सचेत कर उन्हें संबंधित जानकारी दी जाएगी। प्रदेश के साथ गुजरात, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर आदि में भी अश्वप्रजाति के पशु बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।

इन जिलों के पशुओं में पाई गई बीमारी- बाराबंकी, हरदोई, बदायूं, सहारनपुर, लखीमपुर।

बीमारी की पुष्टि होने पशुओं को मारने की अनुमति

बीमारी की पुष्टि होने के बाद पशुपालकों को रोगी पशुओं को मार दिए जाने की सलाह दी जाती है। इससे बाकी के जानवरों के साथ पशुपालक भी बीमारी से सुरक्षित रह सकता है। इसके लिए पशुओं को यूथेनेशिया नामक दवा को बड़ी मात्रा में दिया जाता है। इसके बाद पशु गहरी नींद में चला जाता है और लगभग दस मिनट में नींद के दौरान ही उसकी दर्दरहित मौत हो जाती है।

पशुपालक भी आ सकता है बीमारी की चपेट में

अगर पशुपालक बीमार पशुओं के संपर्क में किसी भी तरह से आता है तो यह रोग उसे भी हो सकता है। चारा-पानी देने, पशुओं की साफ सफाई और घोड़ों की मालिश करने के दौरान इसका खतरा बना रहता है। अगर संक्रमित जानवरों के बर्तन में ही अन्य पशुओं को चारा या पानी दिया जाए तो उन्हें भी बीमारी आसानी से लग सकती है।

बरेली के मुख्य पशुचिकित्सा अधिकारी डॉ. विनोद कुमार बताते हैं, “इसके लिए प्रदेश के हर जिले में पशुचिकित्सकों को इस बीमारी से जुड़ी जानकारी देकर ट्रेनिंग दी जा रही है। हम सभी को निर्देश दिए गए हैं कि जांच करवाई जाए और लक्षण मिलते ही सैंपल भेजे जाएं।”

पशुओं की मौत पर पालकों को मिलता है मुआवजा

बीमारी अन्य पशुओं में न हो जाए इसलिए पशुचिकित्सकों के अनुसार रोगी पशुओं को मारना ही उचित समझा जाता है। पशुपालकों को उनके पशुओं की मौत से हुए नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा दिया जाता है। इसमें अश्वपालकों को 25 हजार रुपए और गधा और खच्चरपालकों को 16 हजार रुपए दिए जाते हैं।

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