निराली है ये परम्परा: मुफ्त में खरबूजे खाने हो तो इन गाँवों में जाइये 

Neetu SinghNeetu Singh   16 May 2017 9:19 PM GMT

निराली है ये  परम्परा: मुफ्त में खरबूजे खाने हो तो इन गाँवों में जाइये खरबूजे के फल दिखाते किसान।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

शिवराजपुर (कानपुर नगर)। जिसको भी ताजे मीठे खरबूजे खाने का शौक है उसे कानपुर नगर के शिवराजपुर ब्लॉक में जरूर जाना चाहिए। यहाँ के कई गाँवों में 500 बीघा से भी ज्यादा भूमि में खरबूजे बोये गये हैं। खास बात ये कि यहां खरबूजे बेचे नहीं जाते, बल्कि फ्री में लोगों को बुला-बुलाकर खिलाये जाता है। निश्चित ही आप सोच में पड़ गए होंगे कि फिर ये किसान कमाते कैंसे हैं, तो आपको बता दें कि ये किसान खरबूजा के बीज बेचकर ही हजारों रुपए कमा लेते हैं।

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कानपुर नगर जिला मुख्यालय से 44 किलोमीटर दूर शिवराजपुर ब्लॉक से दक्षिण दिशा में दलीपपुर, काशीपुर, कंजती, देवकली, बाचीपुर, काशीराम निवादा, फट्टा निवादा जैसे कई गाँव हैं, जहां हर साल 500 बीघे से ज्यादा भूमि में खरबूजे की खेती होती है। दलीपपुर गाँव में रहने वाले चन्द्र किशोर यादव (46 वर्ष) का कहना है, “हमारे गाँव में 20 साल से ज्यादा यही परम्परा बनी हुई है कि कोई खरबूजा बाजार में बेचता नहीं है। आस-पास के कंठीपुर, बिकरू, गड़रियनपुरवा सहित दर्जनों गाँव के लोग हर दिन सुबह खरबूजे से नास्ता करने यहां खेत पर आते हैं ।” वे बताते हैं कि इस बार भी उनके गाँव में डेढ़ सौ बीघा से ज्यादा खरबूजे बोये गये हैं। इसकी बुवाई ग्रामीण मार्च तक कर देते हैं, जो जून के पहले सप्ताह से खरबूजे निकलने शुरू हो जाते हैं। फसल अच्छी हुई तो वे बताते हैं कि एक बीघा में लगभग एक कुंतल बीज निकल आता है, जो 14-15 हजार रुपए कुंतल में बिक जाता है ।”

खरबूजे के खेत में बैठे किसान व परिवार के सदस्य।

पूर्वजों के समय से परम्परा

खरबूजे बाजार में न बेचने की बात पर यहां के किसान बताते हैं कि यह परम्परा पुरानी है और इसे उनके पूर्वजों ने ही शुरू किया था। यही कारण है कि इस परम्परा को बदलने के बारे में यहां के ग्रामीण सोचते भी नहीं। इस गाँव में रहने वाले महेश यादव (52 वर्ष) जिन्होंने इस वर्ष छह बीघा खरबूजा बोयें हैं उनका कहना है, “इस बार हर साल की अपेक्षा ज्यादा खरबूजा बोये गये हैं, एक बीघा में दो तीन हजार रुपए लागत आती है, तीन महीने में बीघे भर में 10 हजार रुपये बच जातें हैं खरबूजा फ्री में खाने को मिलता है ।”

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वे बताते हैं कि आस-पास के सभी गाँव में खेती करने वाले परिवारों के घर पर पूरे जून भर दो-तीन रिश्तेदार बने ही रहते हैं। गाँव में ऐसा लगता है जैसे किसी के शादी ब्याह हो। वहीं कंजती गाँव के रहने वाले इंद्रकुमार कटियार (65 वर्ष) का कहना है, “खरबूजे बहुत ज्यादा होते है इसलिए जानवरों को भी काटकर खिलाते हैं, खरबूजा खिलाने से जानवरों का दूध बढ़ जाता है। खरबूजा खाने के बहाने यहां सुबह-सुबह लोगों से मिलने का अच्छा अड्डा भी है। आस-पास गाँव में क्या चल रहा है खेत पर ही पता चल जाता है ।” वो आगे बताते हैं, “आलू खोदाई के बाद उन्हीं खाली खेत में खरबूजा बो देते हैं, जिस खेत के मीठे खरबूजे होते हैं उस खेत में ज्यादा लोग जाते हैं। दूर गाँव से लोग आते हैं वो खरबूजा काटकर बीजा खेत पर छोड़ देते हैं और खरबूजा लेकर चले जाते हैं, खरबूजे के बीज गाँव में ही आकर व्यापारी ले लेते हैं ।”

गाँव में नहीं बनता नाश्ता

पूजा (19 वर्ष) बताती हैं, “पूरे जून महीने में दलीपपुर गाँव में सुबह किसी के घर नाश्ता और खाना नहीं बनता, क्योंकि पूरा गाँव सुबह का नाश्ता खरबूजे खाकर ही करता हैं। रिश्तेदार पूरे जून महीने रहते हैं और वो भी नाश्ता खरबूजे से ही करते हैं। सुबह गाँव के जानवर भी चारे की बजाए खरबूजा ही खाते हैं ।”

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छुट्टियां खेतों में ही कटती हैं बच्चों की

वैष्णवी यादव (13 वर्ष) कहती हैं, “हमारी जून की छुट्टियां बहुत ही मस्ती से खरबूजों के खेत पर कटती हैं। हम अपने मामा के यहाँ नहीं जाते, बल्कि मामा के बच्चे खुद उनके गॉंव आते हैं। खरबूजे खाने के साथ ही खेत में गेम भी खेलते हैं ।” वैष्णवी अपनी सभी सहेलियों के साथ एक खेल खेलती हैं कि जो मीठा खरबूजा नहीं खोज पाया उसे सारे बीज इकट्ठा करने होंगे । वैष्णवी खुश होकर बताती हैं, “इस गेम में हम हमेशा जीत जाती हैं, क्योंकि मीठा खरबूजा ही हम तोड़कर लाते हैं, इतनी मस्ती करते हैं कि छुटियों में कहीं और जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती है ।”

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