आने वाले समय में देश में बढ़ सकता है चारे का संकट 

Diti BajpaiDiti Bajpai   4 March 2017 1:24 PM GMT

आने वाले समय में देश में बढ़ सकता है चारे का संकट भले ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश हो, लेकिन समय के साथ बढ़ रही चारे की खपत से पशुपालकों को चारे की कमी का संकट झेलना पड़ सकता है।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। भले ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश हो, लेकिन समय के साथ बढ़ रही चारे की खपत से पशुपालकों को चारे की कमी का संकट झेलना पड़ सकता है। इसका असर देश के दुग्ध उत्पादन पर भी पड़ सकता है।

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इंडियास्पेंड के आंकड़ों के अनुसार, भारत में दूध और दूध से बने उत्पाद की मांग तेजी से बढ़ रही है। दूध उत्पादन बढ़ाने के लिए भारत को साल 2020 तक 1764 टन अतिरिक्त पशु चारे की जरूरत होगी, लेकिन मौजूदा संसाधनों के आधार पर केवल 900 टन पशु चारा ही उपलब्ध हो सकेगा। यानी जरूरत का केवल 49 फीसदी पशु चारा ही भारत के पास उपलब्ध होगा।

“जो भूसा 500 रुपए प्रति कुंतल में मिल जाता था वो अब 700 रुपए प्रति कुंतल मिल रहा है। इसके अलावा चूनी और चोकर के रेट भी बढ़ रहे हैं। ऐसे में पशुओं का पेट भरना मुश्किल होता है।” ऐसा बताते हैं, केशव रावत (46 वर्ष)।

बरेली जिले से पश्चिम दिशा में 20 किमी दूर भोजीपुरा ब्लॉक के मियांपुर गाँव में केशव डेयरी चलाते हैं। केशव बताते हैं, “एक दिन में एक पशु पर 150-170 रुपए का खर्चा आता है और कोई भी हरा चारा पूरे साल नहीं होता है। इसलिए हरे चारे तो कम दे पाते हैं।”

राष्ट्रीय पोषण संस्थान के अनुमान के मुताबिक भारत में चारे की खेती के लिए चिन्हित भूमि 2020 तक घटकर करीब 14.2 फीसदी रह सकती है, जो 1990 में 83 लाख हेक्टेयर थी। इस समय यह क्षेत्र 79 लाख हेक्टेयर है।

पशुओं को तीन तरह का दिया जाता है चारा

पशुओं को तीन तरह का चारा दिया जाता है, हरा, सूखा और सानी। तीनों तरह के पशु चारे का अभाव है। जितनी जरूरत है उससे हरा चारा 63 फीसदी, सूखा चारा 24 फीसदी और सानी चारा 76 फीसदी कम है। चारे की महत्वता बताते हुए पशुविशेषज्ञ संजय गुप्ता बताते हैं, “दुधारू पशुओं में हरे चारे में प्रोटीन की मात्रा ज्यादा होती है। इसको खिलाने से दूध में वसा की मात्रा अच्छी होती है। एक वयस्क पशु के रोज 50 फीसदी हरा चारा और 50 फीसदी सूखा चारा तो देना ही चाहिए।” भारत में कृषि योग्य भूमि का केवल चार फीसदी पशु चारे के लिए इस्तेमाल की जाती है। पिछले चार दशकों में चारा उत्पादन के लिए उपयोग की जाने वाली जमीन की दर में जरूरी बढ़ोत्तरी नहीं हुई है।

दूध देने वाले पशुओं के दूध देने की दर भारत में दुनिया की औसत दर से करीब आधा कम है और इसकी बड़ी वजह पर्याप्त पशु चारे की कमी को माना जाता है। प्रति गाय-भैंस की दूध उत्पादकता में कमी का सबसे बड़ा कारण है पशुओं का संतुलित आहार। जो छोटे किसान हैं उनके पास जो भी उपलब्ध होता है खिला देते हैं जो किसान व्यावसयिक रूप से गाय-भैंसों को पाल रहे हैं कुछ हद तक वह पशुओं को संतुलित आहार देते हैं।
डॉ. पुतान सिंह, प्रधान वैज्ञानिक, न्यूट्रीशियन विभाग भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान

सरकार चला रही चारा उत्पादन की योजनाएं

पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डॉ. वीके सिंह ने बताया, “सरकार द्वारा अतिरिक्त हरा चारा उत्पादन और चारा उत्पादन योजना चल रही है। इसके तहत प्रदेश के सभी जिलो में नि:शुल्क बीज का भी वितरण किया जा रहा है। इसके लिए वर्ष 2015-16 में दो करोड़ रुपए का बजट भी आया था। इसके अलावा प्रदेश के 10 फार्म जहां पर उन्नतशील चारा बीज उत्पादन किया जा रहा है।”

डॉ. सिंह आगे बताते हैं, “एक मानक के अनुसार उपलब्ध जमीन पर 10 फीसदी अंश में चारा उत्पादित करने से पशुओं को आसानी से चारा उपलब्ध हो सकता है, लेकिन वर्तमान समय में प्रदेश में इसका साढ़े चार फीसदी जमीन पर ही चारा उत्पादन हो रहा है। नेपियर घास को पशुपालकों को उगाना चाहिए क्योंकि यह एक बार बोने से दो साल तक चलती है। हरे चारे के रूप में यह पशुओं के लिए लाभदायक है।”

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