चुनावी शोरगुल में कहीं खो गए गाँव के मुद्दे 

चुनावी शोरगुल में कहीं खो गए गाँव के मुद्दे सावित्री (40 वर्ष) हरचन्दपुर ब्लाक के दिघौरा गाँव की निवासी हैं। उनके पास डेढ़ बीघा खेतिहर जमीन है, उसी से उनका गुजर-बसर होता है।

किशन कुमार, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

रायबरेली। सावित्री (40 वर्ष) हरचन्दपुर ब्लाक के दिघौरा गाँव की निवासी हैं। उनके पास डेढ़ बीघा खेतिहर जमीन है, उसी से उनका गुजर-बसर होता है। आज तक सावित्री को किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल पाया है। नेताओं को कोसते हुए सावित्री बताती हैं, “सब आपन-आपन झोंके हैं, कोऊ हम पंचन के बात सुन ही नहीं रहा है, बस अपने-अपने नेता के गुन गा रहे हैं। हमका तो लागत है अबकिहूं धोखा होई देखि लीन्हों।”

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रायबरेली जिला उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी खास पहचान रखता है। इस बार रायबरेली का चुनावी अंदाज कुछ बदला-बदला नजर आ रहा है। लगभग सभी पार्टियों के चुनावी प्रबंधन से लेकर प्रचार तक की कमान युवाओं के हाथों में है जो प्रचार-प्रसार के अत्याधुनिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। नगर और कस्बाई शोरगुल से दूर गाँवों का हाल जानने की कोशिश में गाँव कनेक्शन ने बात की गाँव-गिरांव के उन मतदाताओं से जो सोशल मीडिया की गहमागहमी से दूर अपनी समस्याओं से जूझ रहे हैं।

जिले में चुनाव के वादों को नेता कैसे भुलाते हैं, इसका जीता जागता उदहारण जमुना देवी (65 वर्ष) की टूटी-फूटी कोठरी है। जमुना के बेटे-बहू परदेसी हो गये हैं और जमुना दूसरे के खेतों में मजदूरी करके पेट पाल रही हैं। बछरावां ब्लाक से 14 किमी दूर पूर्व में स्थित रानीखेड़ा गाँव की जमुना देवी बताती हैं, “रोज गाँव में नए-नए नेता आवत हैं। कोऊ हाथ जोरत है कोऊ पाँव लागत है। मुला कोऊ हमार गिरही कोठरी देखै नहीं चलत है।” बछरांवा रायबरेली मुख्य मार्ग पर साइकिल मरम्मत चलाने वाले बिन्दा (52) कहते हैं, “भइया अब नये-नये लरिका होइगे हैं। बड़ी-बड़ी बातें करत हैं मुला हम पंचन के काम की एकौ बात नहीं होई रही। हमका मालूम है कोऊ कुछौ न करी। मुला वोट तो दीन्हैं जाइ कोहू न कोहू का।”

लालगंज ब्लाक के मदूरी गाँव निवासी रामकुमार (46 वर्ष) बताते हैं, “तीस साल से यहां की नहरों में पानी नहीं है पर इसकी बात कोई नेता नहीं कर रहा है।”

काफी दिनों से लालगंज में एक स्टेडियम बनाने की बात हो रही है पर केवल हवा-हवाई हो कर रह जाती है।लालगंज की दो महिला खिलाड़ियों को प्रदेश सरकार का रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार मिल चुका है।
अतीकुर्रहमान रिजवी, लालगंज में मार्शल आर्ट अकादमी चलाने वाले

खीरों ब्लाक के उदवतपुर निवासी द्वारिका (45 वर्ष) बताते हैं, “अधिकांश सोलर लाइटें खराब हैं और इनकी मरम्मत के लिए कौन विभाग जिम्मेदार है, किसी को नहीं पता।”

सोनिया के गोद लिये गाँव में मात्र एक ही पक्का मार्ग

सांसद सोनिया गांधी के गोद लिए गाँव उड़वा की बात की जाए तो इस पंचायत में नौ मजरे हैं, पर यहां केवल एक ही मार्ग पक्का है। एक टूटा-फूटा खड़ंजा है, बाकी सभी रास्ते कच्चे हैं, जो बरसात में सभी मजरों को एक-दूसरे से जुदा कर देते हैं।

उड़वा के निवासी मुन्ना मौर्या (32 वर्ष) बताते हैं, “ग्राम सभा में एक भी सामुदायिक केन्द्र नही हैं। यहां शादी-ब्याह व अन्य कार्यक्रमों के लिए खुले मैदान का ही सहारा है।” बछरांवा, लालगंज, ऊंचाहार, सलोन के बस अड्डों की हालत बेहद दयनीय है। बछरांवा निवासी मोटर पार्ट व्यवसायी मन्टू दीक्षित (28 वर्ष) बताते हैं, “न जाने कितने दिनों से सुन रहे हैं कि बछरांवा बस अड्डे का कायाकल्प होने वाला है। अब तो उम्मीद ही खत्म हो गयी है कि कभी ऐसा होगा।” ऐसे न जाने कितने मुद्दे हैं, जिनसे रायबरेली जिले के ग्रामीणों का रोज़ सामना होता है पर इस चुनावी बयार में इन मुद्दों पर कोई बात नहीं हो रही है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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