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इस वर्ष गौरेया दिवस पर लोग शांत

इस वर्ष गौरेया दिवस पर लोग शांतभारत में वर्ष 2005 से 2012 तक तकरीबन 50 फीसदी क्षेत्र में गौरेया गायब हो चुकी हैं।फोटो-इंटरनेट


स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क
लखनऊ।
पिछले वर्ष गौरेया संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए सरकार ने गौरेया बचाव के लिए बड़े स्तर पर देश के सभी राज्यों में अभियान किए, लेकिन इस बार गौरेया संरक्षण पर सरकारों ने अपनी नज़रें फेर ली हैं।


प्रदेश सरकार की अगुवाई में पिछले वर्ष गौरेया संरक्षण के लिए प्रदेश में चार करोड़ छात्र-छात्राओं द्वारा सरकारी व निजी विद्यालयों में रैलियां निकाली गई, लकड़ी के घरौंदे बांटे गए और सरकार ने भी गौरेया दिवस पर विशेष आयोजन किया था।

बदलती जलवायु के कारण विश्व में गौरेया की संख्या तेज़ी से घट रही है।चिड़ियों के संरक्षण और उनके बचाव के आंकलन के ब्रिटेन की रायल सोसाइटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ बर्डस इस वर्ष गौरेया को अपनी रेड लिस्ट में शामिल किया है। वहीं आंध्र विश्वविद्यालय के इस वर्ष के अध्यन में भी गौरेया की संख्या में 60 फीसदी कमी देखी गई है।


ब्रिटेन की रायल सोसाइटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ बर्डस इस वर्ष गौरेया को अपनी रेड लिस्ट में शामिल किया है।आंध्र विश्वविद्यालय के इस वर्ष के अध्यन में भी गौरेया की संख्या में 60 फीसदी कमी देखी गई है।

आंध्र विश्वविद्यालय के इस वर्ष के अध्यन में देश में गौरेया की संख्या में 60 फीसदी कमी देखी गई है। फोटो-इंटरनेट

देश में इस वर्ष गौरेया दिवस को लेकर लोगों की चुप्पी का मुख्य कारण बताते हुए प्रदेश में बड़े स्तर पर पक्षियों के संरक्षण पर काम कर रहे अनूप मणि त्रिपाठी बताते हैं,'' इस वर्ष गौरेया दिवस पर लोगों का ध्यान ना आकर्षित होने का सबसे बड़ा कारण प्रदेश में नई सरकार के आने की गर्मागर्मी है। दूसरा स्कूलों में इस समय बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं। इसलिए स्कूलों में पिछले वर्ष की अपेक्षा इस बार गौरेया दिवस पर शांति है।''

महाराष्ट्र की बोम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएमएचएस) के मुताबिक भारत में वर्ष 2005 से 2012 तक तकरीबन 50 फीसदी क्षेत्र में गौरेया गायब हो चुकी हैं।

उत्तरप्रदेश में गौरेया की जनसंख्या लगातार होने का कारण बताते हुए यूपी स्टेट एनवायरेनमेंटल ऐससमेंट एथोरिटी के डॉ. एमजेड हसन ने बताते हैं, ''गौरेया काकून, बाजरा, धान पके हुए चावल के दाने आदि खाती है लेकिन अत्याधुनिक शहरीकरण के कारण उसके प्राकृतिक भोजन के स्त्रोत समाप्त होते जा रहे हैं। उनके आशियाने भी उजड़ रहे हैं। यही नहीं आजकल के बने घरों में घोसले बनाने की जगह ही नहीं रह गई है। गाँवों में भी घर बनने के तरीकों में बदलाव आया है,इसीलिए प्रदेश में गौरैया लगातार कम हो रही हैं।''भारत में वर्ष 2005 से 2012 तक तकरीबन 50 फीसदी क्षेत्र में गौरेया गायब हो चुकी हैं।

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