चूल्हे के सहारे 55% स्कूलों के मिड-डे-मील 

चूल्हे के सहारे 55% स्कूलों के मिड-डे-मील सोनभद्र में स्कूल में चूल्हे पर लकड़ी से ही खाना बनाना पड़ रहा है।

दुद्धी (सोनभद्र)। “तीन वर्षों से स्कूल में चूल्हे पर लकड़ी से ही खाना बनाना पड़ रहा है। चूल्हे पर खाना बनाते समय धुएं के कारण आँखों में दर्द और जलन होने लगती है। इतने समय से बस सुनते ही आ रहे हैं कि अगले महीने गैस आ जाएगी, मगर अब तक नहीं आ सकी।” यह दर्द बयां किया दुद्धीब्लॉक के धनौरा प्राथमिक विद्यालय की रसोइया विद्यावती देवी (34 वर्ष) ने।

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प्रदूषण रोकने के लिए चूल्हे पर भोजन पकाने की व्यवस्था को धीरे-धीरे समाप्त किया जा रहा है। हर घर तक उज्जवला योजना के तहत गैस सिलेंडर पहुंचाने की सरकार कोशिश कर रही है, लेकिन परिषदीय स्कूलों की व्यवस्था इसे मुंह चिढ़ा रही है। उत्तर प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिला सोनभद्र में एक सर्वे के मुताबिक, करीब 55 फीसदी प्राथमिक स्कूलों में अभी भी चूल्हे पर लकड़ी से एमडीएम बनता है। यहां से निकलने वाला धुंआ बच्चों की आंख को भी नुकसान पहुंचाता है और तो और रसोइयों की भी आंख लाल हो जाती है।

इस समस्या के समाधान के लिए रसोइयां संघ से जुड़े लोग कई बार गैस सिलेंडर के लिए मांग कर चुके हैँ। प्रदेश में मध्याह्न भोजन योजना स्कूल में भोजन उपलब्ध कराने की सबसे बड़ी योजना है, जिसमें रोजाना सरकारी सहायता प्राप्त 11.58 लाख से भी अधिक स्कूलों के 10.8 करोड़ बच्चे शामिल हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के 2015 के आकड़ों के अनुसार, नेशनल प्रोग्राम मिड-डे-मील का भोजन 10.38 करोड़ बच्चे कर रहे हैं और यह 11.58 लाख स्कूलों में चलाई जा रही है।

प्राइमरी स्कूलों में गैस का प्रबंध न होने से चूल्हे पर बनता है खाना।

दुद्धी ब्लॉक में धनौरा गाँव के प्राथमिक विद्यालय बैगा टोला की रसोइया संगीता देवी बताती हैं, “हम लोगों को लकड़ी से बच्चों के लिए खाना बनाने में काफी तकलीफ उठानी पड़ती है। छोटे से रसोइघर में धुएं से तो परेशानी होती ही है और साथ ही जल भी जाते हैं। हम लोग किसी से नहीं कह पाते।” प्रधानाध्यापिका रंजू गुप्ता बताती हैं, “कई वर्ष बीत गए लेकिन अभी तक गैस का कनेक्शन नहीं हो पाया है। विद्यालय में मिड-डे मील चूल्हे पर ही बनताहै।” वहीं करहिया गाँव के सहायक अध्यापक सुनील श्रीवास्तव ने बताया, “बच्चों के लिए बनने वाले मिड-डे मील के आए बजट से ही गैस का कनेक्शन लिया जाता है।” दुद्धी ब्लॉक के उपखंड शिक्षा अधिकारी शैलेश मोहन बताते हैँ, “अधिकारियों ने गैस सिलेंडर का इंतजाम करने के लिए तो कह दिया, लेकिन इसके लिए अब तक कोई बजट अलग से नहीं आया। इसलिए हर स्कूल में गैस सिलेंडर का इंतजाम नहीं हो सका है। इस स्थिति में रसोइया लकड़ी पर भी मिड-डे-मील पकाती हैं।”

जाबर के प्रधानाध्यपक चंद्रेश मौर्य बताते हैँ, “जिले के किसी भी प्राथमिक विद्यालय में गैस कनेक्शन लेने का पैसा नहीं दिया जाता है। स्कूल अपने ही खाते से कनेक्शन करवाते हैं।” मजबूरी में बच्चों का भोजन चूल्हे में बनता है।”

आवेदन के बाद अभी तक नहीं मिला सिलेंडर

जिले के परिषदीय स्कूलों में मिड-डे-मील पकाने के लिए गैस सिलेंडर लेने के लिए विभागीय स्तर से प्रयास किया जा रहा है। जिले के करीब आठ सौ स्कूलों में गैस कनेक्शन के लिए विभिन्न गैस एजेंसियों में आवेदन किया गया है, लेकिन अब तक वहां से कनेक्शन का कागज ओके नहीं हुआ।

जिले में शिक्षा विभाग की स्थिति

  • 2491 परिषदीय स्कूलों में बनता है मिड-डे-मील
  • 1102 स्कूलों में फिलहाल है गैस का कनेक्शन
  • 2.91 लाख बच्चों को मिलता है प्रतिदिन मिड-डे-मील
  • 800 से अधिक स्कूलों की तरफ से आवेदन

मिड डे मील बनाने वाले कर्मचारियों का आरोप है कि आवेदन के बाद भी नहीं मिला कनेक्शन और गैस।

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