नोटबंदी के बाद शहरों से गांव लौट रहे मजदूर, जनवरी के पहले हफ्ते तक 84 लाख ने मांगा काम

Swati ShuklaSwati Shukla   12 Jan 2017 1:53 PM GMT

नोटबंदी के बाद शहरों से गांव लौट रहे मजदूर, जनवरी के पहले हफ्ते तक 84 लाख ने मांगा कामनोटबंदी के साथ मनरेगा में लक्ष्य को पूरा करना भी बताया जा रहा है कारण।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। देश भर में दिसम्बर महीने में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत अन्य महीनों की तुलना में रोज़गार की मांग 60 प्रतिशत बढ़ी है। इसका कारण नोटबंदी के चलते गाँव लौटे विस्थापित श्रमिकों को माना जा रहा है। देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में मनरेगा के तहत काम की मांग बढ़ने का सिलसिला विधानसभा चुनावों के चलते जारी रह सकता है।

केंद्र के आंकड़ों के अनुसार जुलाई से नवंबर 2016 तक मनरेगा के तहत औसतन हर महीने रोज़गार की मांग 30 लाख थी। दिसंबर में औसत मांग 50 लाख पहुंच गई। वहीं 8 जनवरी 2017 के आंकड़ों के मुताबिक मजदूरों की ओर से रोजगार की मांग 83.60 लाख पहुंच गई, जो नोटबंदी के पहले 30 लाख रोजगार की मांग की तुलना में करीब तीन गुना है।

केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार जुलाई से नवंबर 2016 तक मनरेगा के तहत औसतन हर महीने रोज़गार की मांग 30 लाख थी। दिसंबर में औसत मांग 50 लाख प्रतिदिन पहुंच गई। वहीं 8 जनवरी 2017 के आंकड़ों के मुताबिक मजदूरों की ओर से रोजगार की मांग 83.60 लाख पहुंच गई, जो नोटबंदी के पहले 30 लाख रोजगार की मांग की तुलना में करीब तीन गुना है।

उत्तर प्रदेश की बात करें तो नोटबंदी के चलते दिसंबर माह में बढ़ी मांग आगे के महीनों में भी जारी रह सकती है। क्योंकि प्रदेश में आचार संहिता लागू होती ही, सभी सरकारी निर्माण कार्य भी ठप हो गए हैं, इससे मजदूरों को गाँवों में लौटना लगातार जारी है। साथ ही यूपी में रोज़गार की मांग बढ़ना इसलिए भी संभव है क्योंकि मार्च के बाद से अटके फंड में से कुछ हिस्सा हाल ही में राज्य को प्राप्त हुआ है, जिसके बाद प्रधानों ने ग्रामीण स्तर पर काम शुरू करा दिये हैं। शहर में पुताई का काम करने वाले बाराबंकी के हरख ब्लॉक के निवासी संदीप कुमार रावत (40 वर्ष) काम न मिल पाने के चलते गाँव लौट आए थे। अभी वे अपने कुछ साथी मजदूरों के साथ मिलकर गाँव में नाली बनाने का काम कर रहे हैं। “बहुत दिन बाद काम मिला है, पिछली बार का पैसा भी नहीं मिला लेकिन पता चला जल्दी पैसा आ गया है, तो गाँव वापस आ गये,” रावत ने बताया।

कुछ मजदूरों जो बड़े सरकारी संस्थानों या निर्माण कार्यों में कार्यरत थे वे नोटबंदी के असर तो झेल ले गए, लेकिन आचार संहिता घोषित होते ही उन्हें भी काम से हाथ धोना पड़ा, जिसके कारण अब वे अपने-अपने गाँव लौट रहे हैं। लौटने वाले ये सभी मजदूर अपने प्रधान से मनरेगा के तहत रोज़गार की मांग कर रहे हैं, जिसके चलते प्रधानों पर भी दबाव बढ़ा है।

“पैसा आने के बाद चार दिन पहले गाँव में कच्ची सड़क बनाने का काम शुरू कर दिया गया है। पैसे नहीं मिले थे तो पिछले चार माह से कोई काम नहीं हुआ था” लखनऊ जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर अरम्भा ग्राम पंचायम के प्रधान राजेन्द्र कुमार आगे बताते हैं, “आचार संहिता लगी है तो हो सकता है आगे पैसा न मिला इसलिए जितना पैसा है उतना ही काम कराएंगे, एडवांस में नहीं कराएंगे। पैसे की डिमाण्ड कर दी है”।

मनरेगा का पैसा न मिलने की वजह से काम देने में समस्या हो रही थी लेकिन जैसे ही पैसा आया वैसे ही लोगों की भी काम के लिए मांग बढ़ने लगी है। वर्तमान में जो मजदूर काम मांगेगा उसे काम दिया जायेगा।
प्रतिभा सिंह, उपायुक्त (मनरेगा, उ.प्र.)

उपायुक्त ने केंद्र से यूपी को प्राप्त फंड की जानकारी देते हुए कहा कि जून के बाद नवंबर माह में सिर्फ मजदूरी का करीब 750 करोड़ आया था, जबकि मैटेरिय़ल कंपोनेंट (सामग्री) का पैसा नहीं मिला है। फिलहाल करीब 1500 करोड़ रुपये यूपी को केंद्र से मिलना बाकी है। इस बीच मनरेगा के तहत निर्धारित लक्ष्य की जानकारी देते हुए मनरेगा के अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी, यूपी रामधीरज बताते हैं, “उत्तर प्रदेश को जो दिसम्बर तक का जो लक्ष्य दिया गया था उससे 8 प्रतिशत ज्यादा पूरा किया गया है”।

पूरे देश में बढ़ी है मरनेगा में काम की मांग।

देश में रोजगार के दिन घटे

देश भर में दिसंबर माह में रोजगार की मांग भले ही बढ़ी हो लेकिन यदि इसकी तुलना पिछले वर्ष के समान अंतराल से करें तो पता चलता है कि देश भी पिछले वर्ष के मुकाबले रोज़गार के दिन घटे हैं। मनरेगा वेबसाइट के मुताबिक 2015-16 में नवंबर में करीब 135.2 लाख लोगों ने रोज़गार की मांग की, जबकि दिसंबर से मांग बढ़कर 187.7 लाख हो गई। 2016-17 में नवंबर में मांग 102.7 लाख रही जो दिसंबर में बढ़कर 137 लाख हो गई।

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