अब नहीं दिखते लंगोट वाले पहलवान, गाँव से गायब हुआ दंगल

अब नहीं दिखते लंगोट वाले पहलवान, गाँव से गायब हुआ दंगलहाल ही में रिलीज हुई फिल्म दंगल को तो लोगों ने खूब पसंद किया लेकिन असल में इस खेल के लिए न तो सरकार कुछ कर रही है और न ही युवा अपने को इस खेल के लिए बचा पा रहे हैं।

अजय मिश्र- स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

स्वयं डेस्क

कन्नौज। एक हट्ठे-कट्ठे व्यक्ति ने अपने जैसे ही दूसरे साथी की लंगोट पकड़कर उसे पटखनी दी, तो आस-पास खड़ी सैकड़ों की भीड़ ने तालियां बजाकर खुशी का इजहार किया। मिट्टी के ढेर पर दांव-पेंच में फंसाकर पहलवान ने अपने साथी को दबा लिया और कुश्ती जीत ली। हम बात कर रहे हैं हिन्दुस्तानी ‘दंगल’ की, जो पहलवानों के बीच अपने भारतवर्ष में वर्षों से हो रहा है पर अब देसी कुश्ती दमतोड़ रही है।

हाल ही में रिलीज हुई फिल्म दंगल को तो लोगों ने खूब पसंद किया लेकिन असली में देसी मिट्टी की खुशबू लिए इस खेल के लिए न तो सरकार कुछ कर रही है और न ही युवा अपने को इस खेल के लिए बचा कर रख पा रहा है।

कन्नौज जिले में ही नहीं बल्कि सूबे में कभी-कभार ही पहलवानों के बीच देसी कुश्ती देखने को मिलती है, जो कुश्तियां होती भी हैं उनमें अधिकतर पहलवान ही जुड़ाव रखते हैं। एक-एक कुश्ती लाखों रुपए में होती थी, अब घटकर हजारों में रह गई है।

कन्नौज जिले के तिर्वा तहसील क्षेत्र के हरचंदापुर निवासी पहलवान विनोद यादव ‘सारंग’ (37 वर्ष) बताते हैं, ‘पहलवानों के लिए अखाड़ा नहीं है। अभ्यास करने के लिए डंबल और वेटलिफ्टिंग नहीं है। कसरत के लिए सामग्री होनी चाहिए। पंजाब और हरियाणा में सरकार सहयोग करती है। वहां पर प्रधान और बीडीओ स्तर पर व्यायामशाला बनी हुई है। पक्का अखाड़ा, जिम, रूम और कमेटियां भी हैं। इससे बड़े होने वाले बच्चे भी प्रेरित होकर कुश्ती से जुड़ते हैं। सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। इससे पहलवान भटक रहे हैं।’

पहलवानों के लिए लागू हो पेंशन व्यवस्था

उन्नाव जिले के दरोगाबाद निवासी रामआसरे पांडेय का कहना है कि ‘दंगल’ का अस्तित्व मिटता जा रहा है। सरकार सहयोग नहीं करती है। वह दूसरे खेलों जैसे क्रिकेट, वॉलीबाल पर ही ध्यान लगाती है। इन पर ही दूसरे लोग भी सहयोग करते हैं। मेरा मानना है कि पहलवानों के लिए पेंशन व्यवस्था लागू की जाए। तब ही देसी कुश्तियों में बढ़ोत्तरी हो सकेगी। साथ ही पहलवानों की खुराक भी महंगी हो रही है। बादाम और दूध पहले से काफी महंगा हो गया है।

देसी व्यायामशाला बनवाई जाए। पुराने पहलवानों को बुलवाकर लोगों को जानकारी और जागरूक किया जाए। प्रोत्साहन के लिए इनामी कुश्ती कराई जाए। मशहूर दंगल के पहलवानों को भी बुलाया जाए, तभी लुप्त होती विधा को आगे बढ़ाया जा सकता है। उनके विभाग में दंगल नहीं आता है फिर भी उन्होंने कई लोगों को आगे बढ़ाने में सहयोग किया है। अब तो गद्दे वाली कुश्ती ही कहीं-कहीं देखने को मिलती है।
अमिताभ कुमार ,जिला युवा कल्याण अधिकारी, कन्नौज

गलत आदतों में पड़ जाते हैं युवा

औरैया जिले के सहायल निवासी गोरे पहलवान के अनुसार, ‘अब खेल के नाम पर लोग क्रिकेट को ही जानते हैं। वर्तमान समय में युवा अपने को संभाल भी नहीं पाते हैं गलत आदतों में पड़ जाते हैं, जिससे दंगल कम ही देखने को मिलते हैं। देसी कुश्ती को अगर जीवित रखना है तो लोगों को पान, मसाला और नशा छोड़ना पड़ेगा। सरकार से किसी भी तरह का सहयोग नहीं मिलता है।’ केवल कन्नौज में ही एक साल में तीन-चार स्थानों पर दंगल होते हैं। इसमें कनौरा गाँव, जनखत गाँव, क्षेमकली मंदिर वगैरह शामिल हैं।

लोग दूध बिक्री करने लगे हैं। खाते भी नहीं हैं। कुश्ती को बढ़ावा देने के लिए लोग युवाओं को सिखाएं और पहलवानी कराए। व्यायामशाला भी होनी चाहिए। उनके यहां जो भी प्रधान बनता है वह हर साल कुश्ती कराता है। एक साल कुश्ती नहीं भी हुई थी।
विनोद यादव, पूर्व प्रधान, जनखत कन्नौज

कुश्ती का जिक्र पौराणिक कथाओं में मिलता है

कुश्ती का जिक्र रामायण और महाभारत में मिलता है। रामायण में जहां बाली-सुग्रीव के बीच मल्ल युद्ध यानी कुश्ती हुई थी वहीं महाभारत में भी भीम- दुर्योधन और श्रीकृष्ण के संकेत पर भीम द्वारा जरासंघ से लड़ाई भी मल्लयुद्ध का ही उदाहरण थी। इस प्रकार के युद्ध में एक नैतिक भावना रहती थी। इनके वर्णन में यह बात बखूबी पता चलती है। ऐसा कहा जाता है कि पुराने समय में जब मनुष्य ने अस्त्र-शस्त्र चलाने का हुनर नहीं सीखा था जो मल्लयुद्ध के द्वारा ही द्वंद होता था। कुश्ती को मल्लयुद्ध इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें दोनों पहलवान युद्ध करने से पहले बाजुओं में मिट्टी रगड़ते हैं।

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