पार्किंग का अड्डा बना बरेली का राजकीय आयुर्वेदिक मेडिकल कालेज

पार्किंग का अड्डा बना बरेली का राजकीय आयुर्वेदिक मेडिकल कालेजसाहू रामनरायण मुरली मनोहर आयुर्वेदिक मेडिकल कालेज।

अमरकांत, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

बरेली। उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के मेडिकल कालेज की अपनी अलग ही पहचान रही है, जहां से प्रति वर्ष 40 छात्र-छात्राएं आयुर्वेद चिकित्सक बनते हैं। साहू रामनरायण मुरली मनोहर आयुर्वेदिक मेडिकल कालेज की स्थापना 1966 में हुई थी। ऐसे समय जब प्राथमिक शिक्षा के लिए विद्यालय नहीं होते थे उस समय बरेली शहर में मेडिकल कालेज था। बरेली शहर के बीचों-बीच अत्यन्त भीड़-भाड़ वाले इलाके श्यामगंज में 70 के दशक का यह मेडिकल कालेज अतिक्रमण की समस्या झेल रहा है। लोगों ने कालेज को पार्किंग का अड्डा बना लिया है।

मैंने यहां दिसम्बर 2014 में कार्यभार संभाला था तब से मैंने कालेज के उत्थान के लिए लगातार प्रयासरत हूं। मेडिकल कालेज में रोज लगभग 300 से 500 ओपीडी होती हैं। भीड़भाड़ वाली जगह होने के कारण बहुत से मरीज हमारे यहां तक नहीं पहुंच पाते हैं। यहां की सबसे भयंकर समस्या अतिक्रमण है। मार्केट के लोग कालेज को पार्किंग के रूप में प्रयोग करते हैं।
प्रो. प्रीती शर्मा, कालेज की प्राचार्या

वो आगे बताती हैं “कालेज में चौकीदार की व्यवस्था नहीं है, जिसके लिए मैंने शासन को अवगत करा दिया है। यहां हमेशा शोर होता रहता है, जिससे अध्यापन कार्य में समस्या होती है। यदि यह संस्थान शहर के खुले क्षेत्र में हो तो मरीजों की संख्या बढ़ सकती है। पार्किंग की भी समस्या नहीं रहेगी अध्यापन कार्य भी सुचारु रूप से चलता रहेगा, जिसके लिए मैंने से शासन से अनुरोध किया है।”

कालेज की उपलब्धियों के बारे में उन्होंने बताया कि हमारे यहाँ के कई छात्र आज अच्छे चिकित्सक के रूप में गिने जाते हैं। प्रो. शर्मा ने बताया कि हमारे यहां के कई छात्र-छात्राएं देश के नामी संस्थाओं से पीजी कर रहे हैं। कालेज द्वारा कैम्प भी लगाये जाते हैं, लेकिन पर्याप्त फण्ड न होने के कारण उन्हें परिसर में ही लगाया जाता है।

कालेज के छात्र राजेश बताते हैं, “यहां के अधिकतर छात्र दूसरे जिले से हैं। छात्रों के लिए मिलने वाले हॉस्टल में कुर्सी-मेज, अलमारियों की व्यवस्था ठीक नहीं है। छात्राओं के लिए हॉस्टल की व्यवस्था ही नहीं है। छात्राओं को शहर में किराये के मकानों में रहना पड़ता है। कालेज में टॉयलेट, पीने की पानी की समस्या है।”

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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