मल्चिंग व ड्रिप तकनीक से तरबूज की खेती

मल्चिंग व ड्रिप तकनीक से तरबूज की खेतीमल्चिंग व ड्रिप तकनीक से तरबूज की खेती।

देवांशु मणि तिवारी,स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

बाराबंकी, मलूकपुर। बाराबंकी जिले के मलूकपुर गाँव के किसान अनिल कुमार वर्मा (49 वर्ष) मल्चिंग और ड्रिप तकनीक की मदद से अलग-अलग किस्मों के तरबूजों की खेती कर रहे हैं। तकनीकी मदद से अनिल न सिर्फ कम समय में तरबूज की अच्छी फसल उगा रहे हैं, बल्कि बाज़ार में उन्हें अपनी फसल का अच्छा दाम भी मिल रहा है।

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बाराबंकी जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर उत्तर दिशा में मलूकपुर गाँव के अनिल कुमार वर्मा 20 एकड़ क्षेत्र में अलग-अलग किस्मों के तरबूज उगा रहे हैं। अनिल बताते हैं, ‘’पहले हम गेहूं, धान जैसी पारंपरिक फसलों की खेती करते थे, पर उससे ज़्यादा मुनाफा न मिलने के कारण हमने वर्ष 2010 में आधुनिक तरीके से तरबूज की खेती शुरू कर दी। तरबूज से हम अब हर साल 25 से 30 लाख की कमाई कर लेते हैं।’’

मल्चिंग और ड्रिप सिंचाई तकनीक की मदद से अनिल को खेती के दौरान होने वाले काम जैसे खरपतवार हटाने, खाद डालने व निराई से छुटकारा तो मिला ही है साथ में उन्हें पहले की तुलना में तरबूज की अच्छी पैदावार भी मिल रही है।

बाराबंकी जिले में खेती में पानी की बचत और लागत कम करने के लिए ड्रिप सिंचाई तकनीक को प्रोत्साहित करने के लिए जिला प्रशासन कई योजनाएं चला चुकी है। जिले में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत किसानों को इसके लिए उद्यान विभाग द्वारा अनुदान भी दिया जा रहा है, जिसमें राज्य व केन्द्र सरकार मिलकर निर्धारित दर का 67 फीसदी व 56 फीसदी (क्रमशः लघु व सामान्य) अनुदान दिया जाता है।

मल्चिंग और ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल कर तरबूज की उन्नत खेती कर रहे अनिल बताते हैं, “हम अपनी खेती में सुधार और नए-नए तरीकों को प्रयोग करने के लिए भारत के विभिन्न राज्यों के कृषि सलाहकारों से फोन पर सलाह लेते रहते हैं और समय-समय पर कृषि विभाग द्वारा आयोजित किसान गोष्ठियों में जाते रहते हैं।”

तरबूज की खेती में मल्चिंग व ड्रिप सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से अनिल अपने क्षेत्र के बाकी किसानों की तुलना में अच्छी फसल उगा रहे हैं और मंडी में पहले से अच्छे भाव पर बेच रहे हैं। अनिल आधुनिक तरीकों से तरबूज की खेती को अपने क्षेत्र के 50 से अधिक किसानों तक पहुंचा चुके हैं।

क्या होती है ड्रिप और मल्चिंग तकनीक

ड्रिप-मल्चिंग पद्धति में खेत को प्लास्टिक बेड़ों से ढक दिया जाता है, जिससे खेत में नमी बनी रहती है और खरपतवार नहीं पनप पाते हैं। यह प्लास्टिक के बेड अलग अलग साइजों में मिलते हैं। इन बेडों के बीच में एक पतला पाइप डाला जाता है, जिस पर 20 इंच की दूरी पर छेद होते हैं। इन छेदों से बूंद-बूंद करके एक पौंधों तक पानी जाता है। इस पाइप के माध्यम से पौंधों तक खादें भी दी जाती हैं।

पहले हम गेहूं, धान जैसी पारंपरिक फसलों की खेती करते थे, पर उससे ज़्यादा मुनाफा न मिलने के कारण हमने वर्ष 2010 में आधुनिक तरीके से तरबूज की खेती शुरू कर दी। तरबूज से हम अब हर साल 25 से 30 लाख की कमाई कर लेते हैं।’

अनिल कुमार, किसान

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