गाँव गाँव जाकर महिलाओं को माहवारी के लिए जागरूक करने के लिये चला रही ब्रेकिंग दि साइलेंस अभियान

Neetu SinghNeetu Singh   8 March 2017 2:00 PM GMT

गाँव गाँव जाकर महिलाओं को माहवारी के लिए जागरूक करने के लिये चला रही ब्रेकिंग दि साइलेंस अभियानउर्मिला चनम पिछले चार वर्षों से ये अभियान चला रही हैं।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। बेंगलुरु में रहने वाली उर्मिला चनम देश के नौ राज्यों और दुनिया के 32 देशों में “ब्रेकिंग दि साइलेंस” अभियान चला रही हैं। इस मुहिम के पीछे ये कोशिश है कि महिलाएं माहवारी पर अपनी चुप्पी तोड़ें। उर्मिला चनम पिछले चार वर्षों से ये अभियान चला रही हैं।

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मूलरूप से मणिपुर राज्य के इम्फाल जिले की रहने वाली उर्मिला चनम (36 वर्ष) किसी संस्था की मालिक नहीं हैं बल्कि खुद अकेले उन्होंने ये निश्चय किया है कि वो गाँव-गाँव में महिलाओं के बीच जाकर उन्हें जागरूक कर रही हैं। अगर महिलाएं चाहें तो वो सब कर सकती हैं जो वो करना चाहती हैं अगर जरूरत है तो बस चुप्पी तोड़ने की।

उर्मिला चनम गाँव कनेक्शन संवाददाता को फ़ोन पर बताती हैं, “सबसे पहले गाँव में काम करने के लिए ये जरूरी है कि महिलाएं अपनी चुप्पी तोड़ें उसके लिए हमें उनसे मिलना होगा। दोस्ताना बर्ताव करना होगा, महिलाओं को उनकी खूबियां बतानी होंगी।” गाँव में जाकर कैसे काम करती हैं इस सवाल के जवाब में उन्होंने बताया, “अगर उत्तर प्रदेश की बात करूं तो जब मैं रायबरेली और अमेठी जिले के गाँवों में गयी हूं तो दो महीने पहले वहां के बारे में पूरा पढ़ती हूं, वहां जो संस्थान काम करते हैं उनसे बात करती हूं, उन संस्थान के साथ मिलकर गाँव में जाकर विजिट करते हैं, वहां की स्थिति और सरकार की पॉलिसी के बारे में जानते हैं, हर गाँव के कम से कम 10 घर में जाती हूं, एक परिवार से 15 मिनट बात करती हूं।”

हमारी पूरी कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा महिलाएं स्मार्ट फ़ोन का इस्तेमाल करें, इंटरनेट से जुड़ें क्योंकि इस मंच से उन्हें देश-दुनिया की जानकारी मिलेगी। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए 8 मार्च महिला दिवस पर स्काइप पर शाम पांच बजे से रात 11 बजे तक एक ऑनलाइन चर्चा करेंगे, जिसमें हर कोई कॉल कर सकता है, अपने सुझाव दे सकता है।
उर्मिला चनम

वो आगे बताती हैं, “माहवारी का खून गंदा नहीं है, ये एक महिला के गर्भवती होने का दायित्व पूरा करता है, साफ़ कपड़े का ही इस्तेमाल करें। कपड़े के निस्तारण की पूरी प्रक्रिया बताती हूं, इसके बाद वहां के संस्थान के साथ मिलकर 500-800 महिलाओं के साथ पांच घंटे की कार्यशाला करती हूं।” उर्मिला कहती हैं, “मेरा काम यहीं समाप्त नहीं हो जाता। मैं वहां के प्रशासन और लोकल मीडिया से भी संपर्क करती हूं। अगर कोई बात मीडिया में छपती है तो वो मेरा सन्देश हजारों लोगों तक एक साथ पहुंचता है।

इसे कैसे बेहतर कर सकते हैं। इसकी राय दे सकता है।” ये कहना है उर्मिला का। वो अफ्रीका का उदाहरण देते हुए बताती हैं, “जिस तरह वहां की सरकार ने साइबर कैफे बनवाएं हैं, जहां महिलाएं और पुरुष अलग-अलग बैठकर डिजिटल इम्पॉवर से जुड़ सकते हैं तो हम इसकी शुरुआत भारत के गाँवों में भी कर सकते हैं।

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