अब भी लाखों लड़कियों को गर्भ में मारा जा रहा हैं

अब भी लाखों लड़कियों को गर्भ में मारा जा रहा हैं72 लाख लड़कियों को नहीं मिला जीने का अधिकार।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। लड़कियों के जन्म से लेकर उनकी शिक्षा और सुरक्षा के लिए सरकार द्वारा भले ही कई योजनाएं बनाई गई हों, लेकिन पिछले दस वर्षों में लड़कों की तुलना में कम हुई लड़कियों की संख्या चिंताजनक बनी हुई है। इन 72 लाख से ज्यादा लड़कियों को जीने का अधिकार नहीं मिला है।

देश-दुनिया से जुड़ी सभी बड़ी खबरों के लिए यहां क्लिक करके इंस्टॉल करें गाँव कनेक्शन एप

हरदोई जिले के शाहाबाद ब्लॉक से चार किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा में नरही गाँव है। इस गाँव में रहने वाली शांती देवी (42 वर्ष) का कहना है, “मैं मूलत: पश्चिम बंगाल की रहने वाली हूं। आज से 28 साल पहले 14 साल की उम्र में मेरी चचेरी बहन ने मुझे बेच दिया था, दुगुनी उम्र के लड़के के साथ मेरी शादी कर दी गयी थी।” वो आगे बताती हैं, “यहां के रीत-रिवाज, परम्पराएं, भाषा, रहन-सहन समझने में मुझे दसियों साल लग गए, अभी भी समझ रही हूं।”

उत्तर प्रदेश में शांती देवी पहली वो महिला नहीं हैं जिन्हें बहार से खरीद कर लाया गया हो और जिनकी जिन्दगी इतनी मुश्किल से चल रही हो, प्रदेश के ऐसे कई जिले हैं जहां पर पिछले कई वर्षों से लड़कियों को खरीद कर लाया जा रहा है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार जहां उत्तर प्रदेश में 1-25 वर्ष आयु वर्ग की कुल जनसंख्या 116202230 है।

वहीं लड़कों की संख्या 61727751 है और लड़कियों की संख्या 54474479 है। इन आंकड़ों के आधार पर लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या 72,53,272 कम है। वर्ष 2001 से 2011 के बीच तक अल्ट्रासाउंड जैसी आधुनिक तकनीकों की पहुंच आम जन मानस तक बहुत कम थी तब लड़कियों की संख्या 72 लाख से ज्यादा कम हुई। अब अल्ट्रासाउंड जैसी सुविधाएं गाँव-गाँव तक पहुंच गई हैं और जिसके लिए कोई कठोर कार्यवाही नहीं की जा रही है तो वर्ष 2021 में जब जनगणना होगी तब ये आंकड़े कहां पहुंचेंगे इसका अंदाजा सहजता से लगाया जा सकता है।

गर्भ में ही मारी जा रही हैं बेटियां

“पिछले दस वर्षों में जो लड़कियों की संख्या कम हो रही है इसका सबसे बड़ा कारण है उन्हें पेट में खत्म किया जा रहा है, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 की 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर भारत के वो राज्य जहां शिशु लिंगानुपात चयन में कठोर विधिक कार्यवाही की गई है वहां के आंकड़ों में सुधार हुआ है जबकि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश जहां विधिक कार्यवाही में कठोरता नहीं बरती गई है

इसलिए यहां के शिशु लिंगानुपात में सुधार नहीं हुआ है।” ये कहना है वात्सल्य संस्था की डॉक्टर नीलम सिंह का। लखनऊ में काम कर रही एक गैर सरकारी संस्था वात्सल्य जो खासकर लड़कियों के जन्म से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य, साफ़-सफाई, बाल अधिकार जैसे मुद्दों पर सक्रिय रूप से पिछले कई वर्षों से काम कर रही हैं।

लोग कहते हैं लड़कों से हमारा वंश चलेगा अगर लड़कियां ही नहीं रहेंगी तो वंश चलाएगा कौन? 10 वर्षों में भारी संख्या में जो लड़कियां कम हुई है उन्हें जिन्दगी जीने जैसा मूल अधिकार ही नहीं मिला, अब 72 लाख से ज्यादा लड़कों की शादियां कैसे होगी जब लड़कियां ही नहीं हैं।
प्रदीप सिंह, वात्सल्य संस्था के प्रतिनिधि

बेटी खरीद कर बनाई जाती हैं बहू

कानपुर देहात जिले से 40 किलोमीटर दूर बैरी दरियाव गाँव के रहने वाले मूलचंद्र कुशवाहा (45 वर्ष) ने बताया, “पहले सोचा था लड़के की शादी आस-पास ही करेंगे, 25 साल लड़के की उम्र हो गयी पर दरवाजे एक भी शादी का रिश्ता नहीं आया। लड़के की उम्र बढ़ती जा रही थी मजबूरी में एक दलाल को 15 हजार रुपए देकर बिहार से अपने लड़के की शादी करवाई।” वो आगे बताते हैं, “हमने अपने दोनों बेटों की शादी बिहार से की है, पिछले कई वर्षों में हमारे पड़ोस में तमाम शादियां दूसरी जगहों से खरीद कर आई हैं, 15-20 हजार में आराम से पूरी शादी हो जाती है, एक दलाल जो हमारा परिचय लड़की वाले से कराता है उसी के माध्यम से पूरी शादी हो जाती है।”

ताजा अपडेट के लिए हमारे फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए यहां, ट्विटर हैंडल को फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें।

Share it
Top