कहां गया मनरेगा का 48 हजार करोड़ का बजट?

कहां गया मनरेगा का 48 हजार करोड़ का बजट?मनरेगा मजदूरों को तीन साल से नहीं मिली मजदूरी।

अरविन्द्र सिंह परमार, स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

ललितपुर। ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने की गारंटी के साथ शुरू हुई मनरेगा में काम की तो गारंटी है, लेकिन तय समय पर भुगतान की कोई गारंटी न होने से लोगों में इसको लेकर भरोसा उठ रहा है। पिछले तीन साल से भुगतान लंबित होने का गुस्सा भी मनरेगा मजदूरों में अब रह-रहकर उभर रहा है। योजना के लाखों रुपए डकारे जाने के मामले भी अधिकारियों आदि की मिलीभगत से खेल किए जाने की ओर इशारा कर रहे हैं।

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गाँवों की सत्तर प्रतिशत आवादी का पलायन रोकने के लिए मनरेगा से रोजगार देने, परिसंम्पति श्रजित करने की योजना हैं, भुगतान लेटलतीफ होने से मजदूरों का मोह भंग हो रहा है! केन्द्र सरकार ने मनरेगा योजना का बजट वित्तीय वर्ष 2017-18 में 38 हजार करोड़ से बढाकर 48 हजार करोड़ किया था। मनरेगा को प्रभावशाली तरीके से हाईटेक करने की वकालत भी की जा रही है। इसकी वजह मनरेगा के भुगतान को लेकर की जा रही गड़बड़ी और लेटलतीफी को रोकना है। लेकिन यूपी में पिछले तीन वर्षो से अटके भुगतान पर सब चुप्पी साधे हुए हैं।

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यूपी में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) के तहत 163.48 लाख जॉब कार्ड की संख्या 237.03 लाख है। मनरेगा के तहत गाँवों में कराए गए कामों के ऐवज में पिछले तीन सालों से लम्बित भुगतान मनरेगा बेवसाईट के अनुसार "वित्तीय वर्ष 15-16 से मजदूरों का 141.39 लाख, कारीगरों का 5097.7 लाख, सामग्री का 89.7 लाख है। पिछले वित्तीय वर्ष 2016-17 में मजदूरों का 9229.1 लाख, कारीगरों का 918.4 लाख, सामग्री का 3486.03 लाख रुपए बकाया है। वर्तमान वर्ष 17-18 में भी मजदूरों की बकाया रकम का आंकड़ा 3918.8 लाख, कारीगरों का 81.86 लाख व सामग्री का 550.43 लाख रुपए तक पहुंच चुका है।

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मनरेगा मजदूर राधा रैकवार की तरह यूपी के हजारों मजदूरों का पैसा बाकी हैं, ऐसे लोगों ने प्रधान, सिक्रेटी से लेकर जिले तक शिकायती की, लेकिन भुगतान नहीं मिला, इन मजदूरों को आश्वासन ही मिलता है कि पैसा ऊपर (सरकार) से जब आएगा, तभी मिलेगा। रोजी रोटी के संकट से निपटने के लिए राधा सहित आज भी 30-35 परिवार राजस्थान-दिल्ली में मजदूरी कर रहे हैं। घर देखने आई ललितपुर जनपद से 80 किमी मड़ावरा ब्लाँक की पारौन ग्राम पंचायत की राधा रैकवार (33वर्ष) बताती हैं, "क्या करे पेट जो पालना है, खाने को फ्री में कोई नहीं देता, मनरेगा का एक साल से पैसा नहीं मिला। हम दोनों पति-पत्नी ने काम किया था, पैसा देने के नाम पर सब लोग कन्नी काट लेते हैं।”

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वो आगे बताती हैं,"अगर गाँव में काम समय पर व पैसा समय पर मिले तो बाहर नहीं जाना पड़ेगा। हमारा तो मनरेगा से मोह भंग हो गया, क्योंकि पैसा नहीं मिलता।"

वहीं महरौनी ब्लाँक ग्राम पंचायत पठा के विनोद (35वर्ष) बताते हैं, "मैंने और मेरी पत्नी ने एक साल पहले 80 दिन काम किया, इसका पैसा आज तक नहीं आया।"

महरौनी ब्लॉक ग्राम पंचायत रमेशरा के शैलेन्द्र सिंह ग्राम प्रधान बताते हैं,"मजदूरों, कारीगरों का पैसा शासन से नहीं आया, जिन पर राज्य केन्द्र की राजनीति होती रही, बेचारे मजदूर पिसते रहे। पलायन बढ़ने का कारण यही रहा। वो बताते हैं कि मजदूरों का मनरेगा से विश्वास उठ गया, अब मजदूरों को काम के लिए बुलाते हैं, लेकिन काम को नहीं आते।"

बार ब्लॉक के छत्रपाल सिंह ग्राम प्रधान सुनवाहा बताते है," मजदूरों, सप्लायर का पैसा नहीं मिला। अब सप्लायर मैटेरियल की सप्लाई नहीं करते, कहते हैं कि पुराना पैसा नहीं मिला और मैटेरियल देकर वे बर्बाद होना नहीं चाहता। अधिकारी सुनते नहीं अब काम करने को कौन तैयार होगा?"

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