निराला के साहित्य का प्रतीक है डलमऊ

निराला के साहित्य का प्रतीक है डलमऊविश्व कवि सूर्य कान्त त्रिपाठी निराला

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

डलमऊ (रायबरेली)। भारत की दूसरी सबसे पुरानी गंगा नगरी कहे जाने वाले डलमऊ का साहित्य से बहुत पुराना रिश्ता है। यहीं पर देश के सूफी कावि धारा के प्रथम कवि मुल्ला दाउद का जन्म हुआ और साथ ही विश्व कवि सूर्य कान्त त्रिपाठी निराला ने यहीं रह कर अपने साहित्यिक जीवन के 20 वर्ष बिताएं।

डलमऊ नगरी गंगा के उत्तरी तट पर स्थित है यह जनपद रायबरेली के विकास क्षेत्र के अंतर्गत आती है। डलमऊ नगरी के लालगंज गाँव के दिलीप बाजपेई (40 वर्ष) डलमऊ की साहित्यिक छवि के बारे में बताते हैं, ‘’वैसे तो डलमऊ को लोग गंगा की वजह से ज्य़ादा जानते हैं पर यहीं पर जाने माने हिंदी व संस्कृत काव्यों के महारथी लावनदास, लालचदास और नरहरिदास जैसे कवियों का जन्म हुआ। यहीं पर निराला जी की शादी हुई। उनको हिंदी में लिखने कि प्रेरणा उनकी पत्नी मनोहरा देवी से मिली जो डलमऊ की रहने वाली थी।”

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कहा जाता है कि देश के महान कवि निराला डलमऊ के गंगा घाट पर अपनी पत्नी मनोहरा के साथ एक छोटे से घर में रहते थे। शादी के कुछ ïवर्षों के बाद निराला ने अकेले यहीं रह कर स्थानीय लोगों को हिंदी साहित्य व रचनाओं के लेखन व गीतों के प्रति प्रोत्साहित करते थे। उन्हीं के नाम पर डलमऊ में निराला साहित्य बनवाया गया है। जहां आज भी अलग- अलग राज्यों के जाने माने कवि हर साल आते रहते हैं। प्रदेशभर में अपने साहित्य और उत्कृष्ट काव्यों, रचनाओं के लिए जिले व राज्य के जाने-माने कवियों व साहित्यकारों को हर वर्ष निराला सम्मान डलमऊ दिया जाता है। स्थानीय लोग डलमऊ को ‘छोटी काशी’ के नाम से भी बुलाते हैं।

बुद्ध पूर्णिमा पर डलमऊ में हर ïवर्ष होने वाले गंगा मेले में लाखों श्रद्धालु गंगा मेले में आते हैं। यहां रहने वाले स्थानीय कलाकार डलमऊ को अपनी कर्मभूमि की तरह मानते हैं।

डलमऊ के रहने वाले स्थानीय लेखक व कवि हरिहर प्रसाद शर्मा बताते हैं, “डलमऊ में रहने वाले ज्य़ादातर लोगों को निराला जी की रचनाएं मुंह जुबानी याद हैं। हम जो भी लिखते हैं उसमें निराला जी के विचारों और भावों को ज़रूर सम्मिलित करते हैं।”

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