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अब मैदानी क्षेत्रों में भी हो रही स्ट्रॉबेरी की खेती 

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

लखनऊ। अभी तक स्ट्रॉबेरी की खेती ठंडे प्रदेशों में की जाती थी, लेकिन अब उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब जैसे प्रदेशों में भी स्ट्रॉबेरी की खेती हो रही है। राजस्थान में कुछ किसान इसहकी खेती कर रहे है।

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किसान इसके लिए अनुकूल भूमि और वातावरण न होते हुए भी स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले के डिंगरोता गाँव के किसान अनिल बलोठिया (35 वर्ष) पिछले दो साल स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं। दो साल पहले हिसार में उन्हें स्ट्रॉबेरी की खेती के बारे में जानकारी मिली, उसके बाद इंटरनेट से सारी जानकारी इकट्ठा की और इसकी खेती शुरू कर दी।

पंजाब के होशियारपुर के रहने वाले कैलाश शर्मा (40 वर्ष) पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों को स्ट्रॉबेरी की नर्सरी उपलब्ध कराते हैं। कैलाश शर्मा बताते हैं, “इधर जितना भी स्ट्रॉबेरी का उत्पादन होता है। दिल्ली, चंडीगढ़ जैसे बड़े शहरों में चला जाता है। सौ दिनों में स्ट्रॉबेरी की फसल तैयार होती है। एक पौधे में 750 ग्राम से एक किलो तक स्ट्रॉबेरी का उत्पादन हो जाता है।

महेन्द्रगढ़ के अलावा हिसार जिला धीरे-धीरे स्ट्रॉबेरी का हब बनता जा रहा है। यहां के कई गाँवों में स्ट्रॉबेरी की खेती हो रही है। यहां के किसानों के लिए दूसरी फसलों के मुकाबले यह फायदे की फसल साबित हो रही है। खेती में ज्यादा मुनाफा देख दूसरे जिलों के किसान भी यहां पर जमीन ठेके पर लेकर स्ट्रॉबेरी की खेती कर रहे हैं।

डेढ़ एकड़ स्ट्रॉबेरी की फसल में चार-पांच लाख की लागत आती है। पैदावार होने के बाद खर्च निकालकर सात-आठ लाख का फायदा हो जाता है। किसान अनिल बताते हैं, “स्ट्रॉबेरी पचास रुपए किलो से लेकर छह सौ रुपए किलो तक बिक जाती है। डेढ़ एकड़ में दो किलो वजन की पचास हजार ट्रे पैदा हो जाती है।”

दो साल पहले हिसार में एक किसान को स्ट्रॉबेरी की खेती करते देखा था, फिर वहीं से मैंने भी सोच लिया कि अपने गाँव में जाकर स्ट्रॉबेरी की खेती करूंगा। इंटरनेट की जानकारी लेने के बाद अपने गाँव में खेती शुरू कर दी है।
अनिल बलोठिया, किसान  

डेढ़ एकड़ में 35 से 40 हजार पौधे लगते हैं, इसके पौधे हिमाचल से लाए जाते हैं, लेकिन अब अनिल नर्सरी यहीं पर तैयार करते हैं। किस्म के हिसाब से प्रति पौधा पांच से लेकर 20 रुपए तक के आते हैं। रोपाई का काम अक्टूबर-नवंबर में किया जाता है। जनवरी-फरवरी महीने में यह तैयार होकर फल दे देती है।

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