फरवरी-मार्च महीने में करें पपीते की खेती 

फरवरी-मार्च महीने में करें पपीते की खेती पपीता जल्द तैयार होने वाली फसल है, एक बार लगा देने पर ये दो बार फल देता है।

लखनऊ। पपीता जल्द तैयार होने वाली फसल है, एक बार लगा देने पर ये दो बार फल देता है। पपीते की फसल से ये फायदा होता है कि इसके साथ दूसरी फसल भी ले सकते हैं। ये मौसम पपीते की फसल लगाने का सही समय है।

कृषि विज्ञान केन्द्र बलिया के कृषि विज्ञान केन्द्र के उद्यान विशेषज्ञ डॉ. राजीव कुमार सिंह बताते हैं, "मार्च में किसान पपीते की खेती की शुरुआत कर सकते हैं, किसानों को रोग अवरोधी किस्मों का चयन करना चाहिए। पपीते की खेती में फल मक्खियां बहुत नुकसान पहुंचाती हैं, इससे बचाव के लिए फ्रूट फ्लाई ट्रैप का प्रयोग करना चाहिए।"

प्रजातियां

पपीते की उन्नतशील प्रजातियों में पूसा डेलीसस 1-15, पूसा मैजिस्टी 22-3, पूसा जायंट 1-45-वी, पूसा ड्वार्फा-45-डी, सीओ-1, सीओ-2, सीओ-3, सीओ-4, कुर्ग हनी, और हनीड्यू मुख्य प्रजातियां किसान लगा सकते हैं।

खेत की तैयारी

पपीते की खेती में पौधे तैयार करने के लिए पहले पौधे तीन मीटर लम्बी एक मीटर चौड़ी और 10 सेमी ऊंची क्यारी में या गमले या पॉलीथीन बैग में पौधे तैयार करते हैं। बीज की बुवाई से पहले क्यारी को 10 फीसदी फार्मेल्डिहाइड के घोल का छिड़काव करके उपचारित करते हैं। इसके बाद बीज एक सेमी गहरे और 10 सेमी की दूरी पर बोते हैं। किसान चाहे तो नर्सरी से भी पौधे खरीद सकते हैं।

पौधों की रोपाई

खेत में पौधों की रोपाई दोपहर बाद शाम तीन बजे के बाद करनी चाहिए। रोपाई के बाद पानी लगाना आवश्यक होता है। जब तक अच्छी तरह से पौधा लग न हो जाए तब तक हर दिन शाम को हल्की सिंचाई करनी चाहिए। पपीते पर मिट्टी चढ़ाना जरूरी होता है। प्रत्येक गड्ढे में एक पौधे को रखने के बाद पौधे की जड़ के आसपास 30 सेमी की गोलाई में मिट्टी को ऊंचा चढ़ा देते हैं ताकि पेड़ के पास सिंचाई का पानी अधिक न लग सके और पौधे को सीधा खड़ा रखते हैं।


सिंचाई

पपीता की फसल के लिए सिंचाई का उचित प्रबंन्ध होना जरूरी होता है। गर्मियों में छह से सात दिन में सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाई का पानी पौधे के सीधे संपर्क में नहीं आना चाहिए।

निराई-गुड़ाई

लगातार सिंचाई करते रहने से खेत की मिट्टी बहुत कड़ी हो जाती है, जिससे पौधों की वृद्धि पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए हर दो-तीन सिंचाई के बाद थालों की हल्की निराई-गुड़ाई करनी चाहिए, जिससे मिट्टी में हवा और पानी का अच्छा संचार बना रहता है।

रोग और कीट से सुरक्षा

पपीते के पौधों में मुजैक, लीफ कर्ल, डिस्टोसर्न, रिंगस्पॉट, जड़ और तना सड़न, एन्थ्रेक्नोज एवं कली और पुष्प वृंत का सड़ना आदि रोग लगते हैं। इनके नियंत्रण में वोर्डोमिक्सचर 5:5:20 के अनुपात का पेड़ों पर सड़न-गलन को खरोचकर लेप करना चाहिए। दूसरे रोगों के लिए व्लाईटाक्स तीन ग्राम या डाईथेन एम-45, दो ग्राम प्रति लीटर अथवा मैन्कोजेब या जिनेब 0.2 फीसदी से 0.25 फीसदी का पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए अथवा कॉपर ऑक्सीक्लोराइट तीन ग्राम या व्रासीकाल दो ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

पपीते के पौधों को कीटों से कम नुकसान पहुंचता है फिर भी कुछ कीड़े लगते हैं जैसे माहू, रेड स्पाईडर माईट, निमेटोड। इनके नियंत्रण के लिए डाईमेथोएट 30 फीसदी 1.5 मिली लीटर या फास्फोमिडान 0.5 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से माहू जैसे का नियंत्रण होता है।

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