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कम आबादी, ज्यादा लाभार्थी, फिर कहां जा रहा राशन?

कम आबादी, ज्यादा लाभार्थी, फिर कहां जा रहा राशन?जिले के बेलसर ब्लॉक की ग्राम पंचायत जफरापुर में हो रहा खेल।

हरी नरायण

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

उमरी बेगमगंज (गोंडा)। आबादी कम है और लाभार्थी ज्यादा हैं, ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर बढ़ी संख्या का राशन कहां जा रहा है। यह घालमेल है जिले के बेलसर ब्लॉक की ग्राम पंचायत जफरापुर में, जहां राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत कोटेदार द्वारा हर माह सभी लाभर्थियों के लिये गोदाम से खाद्यान की उठान जारी है, मगर 465 लाभार्थियों का खाद्यान कौन खा रहा है। दूसरी ओर खाद्य विभाग की वेबसाइट बंद हो जाने से अभी भी सैकड़ों राशन कार्ड के आवेदन लंबित हैं।

बता दें कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 जिले में मार्च 2016 में लागू किया गया। तरबगंज तहसील के बेलसर ब्लॉक की ग्राम पंचायत जफरापुर में पात्र गृहस्थी के अंतर्गत 553 व अंत्योदय के अंतर्गत 43 राशन कार्ड बने हैं। पात्र गृहस्थी और अंत्योदय राशन कार्ड के तहत ग्राम पंचायत में 2,959 लाभार्थी हैं। कागजों में आबादी से ज्यादा राशन कार्ड लाभार्थी होने के बाद भी राशन कार्ड के सैकड़ों आवेदन विभाग की वेबसाइट बंद हो जाने के कारण लंबित हैं।

यदि खाद्य विभाग द्वारा इन आवेदनों को पात्र गृहस्थी सूची में सम्मलित कर लिया गया तो राशन के लाभार्थियों की संख्या लगभग 4,000 हो जायेगी। यहां के उचित दर विक्रेता द्वारा प्रत्येक माह 2959 लाभार्थी के लिए गोदाम से खाद्यान की उठान की जा रही है।

ग्रामीणों ने ऑनलाइन राशन कार्ड के लिए आवेदन भेजे हैं। ऐसे में ग्राम पंचायत का राशन कार्ड बनवाने में कोई लेना-देना नहीं है।
राधे श्याम, प्रधान, जफरापुर

पात्र गृहस्थी सूची में सैकड़ों नाम ऐसे हैं, जो इस ग्राम पंचायत के निवासी नहीं हैं। दावा है कि प्रत्येक माह पयर्वेक्षणीय अधिकारी की मौजूदगी में खाद्यान का वितरण कराया जा रहा है। ऐसे में अधिकारी की मौजूदगी में फर्जी लाभार्थियों को खाद्यान वितरण कर दिया गया। इस सम्बन्ध में उपजिलाधिकारी तरबगंज राम सजीवन मौर्या ने बताया कि मामले में जांच कर कार्रवाई की जायेगी।

यह है प्रावधान

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत पात्र गृहस्थी राशन कार्ड के प्रत्येक लाभार्थियों को 5 किग्रा अनाज देने का नियम है । जिसमे 2 रुपये प्रति किलो गेहूं और 3 रुपये प्रति किलो चावल दिया जाना है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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