झुलसा रोग से फसलों को बचाने की ज़रूरत

झुलसा रोग से फसलों को बचाने की ज़रूरतकड़ाके की ठंड में पाला पड़ना आलू की फसल के लिए खतरनाक। फोटो: गाँव कनेक्शन।

अरुण मिश्रा- (कम्यूनिटी जर्नलिस्ट)

विशुनपुर (बाराबंकी)। कड़ाके की ठंड एवं बदला मौसम गेहूं की फसल के लिए भले ही लाभकारी हो लेकिन पाला पड़ने से अन्य फसलों को काफी नुकसान पहुंच सकता है।

आलू उत्पादकों के लिए हर साल पाला और झुलसा रोग मुसीबत लेकर आता है। ठंड बढ़ने के साथ इनका प्रकोप खेतों में नजर आने लगता है। इसे अगर नजरअंदाज कर दिया गया तो फसलों को काफी नुकसान हो सकता है। कृषि वैज्ञानिक ऐसे में किसानों को सतर्क रहने की सलाह देते हैं।

शीत लहर व पाले से सर्दी के मौसम में सभी फसलों को नुकसान पहुंचता है। टमाटर, आलू, मिर्च, बैगन, मटर, चना, अलसी, जीरा, धनिया, सौंफ आदि फसलो में सबसे ज्यादा 85 से 92 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है। वहीं गेंहू तथा जौ में 10 से 20 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है।

पाले के प्रभाव से पौधों की पत्तियां एवं फूल झुलसने लगते हैं व बाद में झड़ जाते हैं। फलियों एवं बालियों में दाने नहीं बनते हैं व बन रहे दाने सिकुड़ जाते हैं। रबी के सीजन में फसल के विकसित होते समय पाला पड़ने की सर्वाधिक सम्भावनाएं होती हैं। इसलिए किसानों को पाले से फसल बचाने के लिए व्यापक इंतजाम करने चाहिए।

विशुनपुर में कीटनाशक दवाइयों की दुकान चलाने वाले अरुण मिश्रा ने कहते हैं “इस समय किसान झुलसे से प्रभावित फसलों की समस्याएं लेकर ज्यादा आते हैं। एक दिन में लगभग 10 से 15 किसान ऐसी समस्याएं लेकर आते है उन्हें कारवेन्डाजाइम 12 फीसदी व मैकोजेब 63 फीसदी रासायनिक दवाइयों के इस्तेमाल की सलाह दी जाती है।”

झुलसा रोग से बचाने के लिए खेत में करे धुआं

जिला उद्यान अधिकारी जयकरन सिंह ने बताया कि आलू में झुलसा रोग से बचाव के लिए किसानों को खेतों में नमी बना कर रखना चाहिए हो सके तो खेतों के चारों तरफ सुबह शाम धुआं भी करते रहे इसके अलावा मैन्कोजेब 75 फीसदी दो ग्राम प्रति लीटर की दर से सप्ताहिक छिड़काव करने से किसान इस प्रकार के रोगों से फसलों को बचा सकते हैं।

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